भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 428
४२२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

मीति तं पाणावादायोत्तस्थौ तौ ह पुरुषं सुप्तमाजग्मतुस्तमेतैर्नामभिरामन्त्रयाञ्चक्रे बृहन् पाण्डरवासः सोम राजन्निति स नोत्तस्थौ तं पाणिनापेषं बोधयाञ्चकार स होत्तस्थौ ॥ १५ ॥

उस अजातशत्रुने कहा, 'ब्राह्मण क्षत्रियकी शरणमें इस आशासे जाय कि यह मुझे ब्रह्मका उपदेश करेगा, यह तो विपरीत है। तो भी मैं तुम्हें उसका ज्ञान कराऊँगा ही।' तब वह उसका हाथ पकड़कर उठा और वे दोनों एक सोये हुए पुरुषके पास गये। अजातशत्रुने उसे 'हे बृहन्! हे पाण्डरवास! हे सोम राजन्!' इन नामोंसे पुकारा। परंतु वह न उठा। तब उसे हाथसे दबा-दबाकर जगाया तो वह उठ बैठा ॥ १५ ॥

स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं विपरीतं चैतत् किं तत्? यद्ब्राह्मण उत्तमवर्णे आचार्यत्वेऽधिकृतःसन् क्षत्रियमनाचार्यस्वभावमुपेयात्— उपगच्छेच्छिष्यवृत्त्या ब्रह्म मे वक्ष्यतीति। एतदाचारविधि-शास्त्रेषु निषिद्धम्; तस्मात्तिष्ठ त्वमाचार्य एव सन्। विज्ञापयिष्याम्येव त्वामहं यस्मिन्विदिते ब्रह्म विदितं भवति यत्तन्मुख्यं ब्रह्म वेद्यम्।उस अजातशत्रुने कहा—'यह तो प्रतिलोम—विपरीत है। क्या? यह कि उत्तम वर्ण ब्राह्मण आचार्यत्वका अधिकारी होकर भी, इस उद्देश्यसे कि यह मुझे ब्रह्मका उपदेश करेगा, जिसका आचार्यत्वका स्वभाव नहीं है, उस क्षत्रियके प्रति उपसन्न यानी शिष्यभावसे प्राप्त हो। यह आचारविधिका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंमें निषिद्ध माना गया है; अतः तुम आचार्यरूपसे ही स्थित रहो। फिर भी, जिसका ज्ञान होनेपर ब्रह्मका ज्ञान हो जाता है और जो मुख्य ब्रह्म वेद्य है, उसका ज्ञान मैं तुम्हें कराऊँगा ही।'