भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 427

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४२१

| ब्रूयात्, न किञ्चिज्ज्ञातं त्वयेत्येवं ब्रूयात्। तस्माद्भवन्त्येतावन्त्यविद्याविषये ब्रह्माणि। एतावद्विज्ञानद्वारत्वाच्च परब्रह्मविज्ञानस्य, युक्तमेव वक्तुम्—नैतावता विदितं भवतीति। अविद्याविषये विज्ञेयत्वं नामरूपकर्मात्मकत्वं चैषां तृतीयेऽध्याये प्रदर्शितम्। तस्मात् 'नैतावता विदितं भवति' इति ब्रुवता अधिकं ब्रह्म ज्ञातव्यमस्तीति दर्शितं भवति।<br><br>तच्चानुपसन्नाय न वक्तव्यम् इत्याचारविधिज्ञो गार्ग्यः स्वयमेवाह—उप त्वा यानीति—उपगच्छानीति त्वाम्, यथान्यः शिष्यो गुरुम् ॥ १४ ॥ | से [ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता]' ऐसा नहीं कहा जाता, अपितु यही कहा जाता कि 'तुम कुछ भी नहीं जानते।' अतः इतने ब्रह्म अविद्याके अन्तर्गत हैं। इतना विज्ञान परब्रह्मविज्ञानका द्वार है, इसलिये यह कहना उचित ही है कि 'इतनेसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता।' ये ब्रह्म अविद्याके क्षेत्रमें विज्ञेय (उपास्य) और नामरूप कर्मात्मक हैं, यह बात तृतीय¹ अध्यायमें दिखायी गयी है। अतः 'इतनेसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता' ऐसा कहकर यह दिखाया गया है कि अभी इससे अधिक ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करना है।<br><br>उस ब्रह्मका उपदेश अनुपसन्नको (जो शिष्यभावसे शरणमें न आया हो उसको) नहीं करना चाहिये। अतः आचारविधिको जाननेवाला गार्ग्य स्वयं ही कहता है; 'मैं तुम्हारे प्रति उपसन्न होऊँ, जैसे कि कोई दूसरा शिष्य अपने गुरुके प्रति होता है' ॥ १४ ॥ |


गार्ग्यका हाथ पकड़कर अजातशत्रुका एक सोये हुए पुरुषके पास जाना और प्राणोंके नामसे न उठनेपर उसे हाथ दबाकर जगाना

स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं चैतद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद्ब्रह्म मे वक्ष्यतीति व्येव त्वा ज्ञपयिष्या-


१. उपनिषद्के प्रथम अध्यायमें।