भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 426
४२०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
SanskritHindi
किमेतावद्विदितं विदितमेव न भवति ? इत्युच्यते—न, फलवद्विज्ञानश्रवणात् । न चार्थवादत्वमेव वाक्यानामवगन्तुं शक्यम्; अपूर्वविधानपराणि हि वाक्यानि प्रत्युपासनोपदेशं लक्ष्यन्ते—'अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानाम्' इत्यादीनि । तदनुरूपाणि च फलानि सर्वत्र श्रूयन्ते विभक्तानि । अर्थवादत्वे एतदसमञ्जसम् ।तो क्या इतना जानना जानना ही नहीं होता ? इसपर कहते हैं—ऐसी बात नहीं है, यहाँ तो फलयुक्त विज्ञान (उपासना) का श्रवण है। इन वाक्योंको अर्थवाद भी नहीं माना जा सकता; क्योंकि ये 'अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानाम्' इत्यादि वाक्य प्रत्येक उपासनाके उपदेशमें अपूर्व विधि करनेवाले दिखायी देते हैं। और उनके अनुसार ही सर्वत्र अलग-अलग फल सुने जाते हैं। अर्थवाद होनेपर इन सबका सामञ्जस्य नहीं हो सकता।
कथं तर्हि नैतावता विदितं भवतीति ? नैष दोषः, अधिकृतापेक्षत्वात् । ब्रह्मोपदेशार्थं हि शुश्रूषवेऽजातशत्रवेऽमुख्यब्रह्मविद्गार्ग्यः प्रवृत्तः, स युक्त एव मुख्यब्रह्मविदाजातशत्रुणामुख्यब्रह्मविद्गार्ग्यो वक्तुम्—यन्मुख्यं ब्रह्म वक्तुं प्रवृत्तस्त्वं तन्न जानीष इति । यद्यमुख्यब्रह्मविज्ञानमपि प्रत्याख्यायेत, तदैतावतेति नतो फिर ऐसा क्यों कहा कि इतनेसे ही ब्रह्म ज्ञात नहीं होता ? यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यह कथन अधिकारी पुरुषोंकी अपेक्षासे है। अमुख्य ब्रह्मको [परब्रह्मरूपसे] जाननेवाला गार्ग्य ब्रह्मोपदेश सुननेके इच्छुक अजातशत्रुको ब्रह्मका उपदेश करनेके लिये प्रवृत्त हुआ था। अतः मुख्य ब्रह्मवेत्ता अजातशत्रुद्वारा अमुख्य ब्रह्मज्ञ गार्ग्यके प्रति ऐसा कहा जाना उचित ही है कि जिस मुख्य ब्रह्मका उपदेश करनेके लिये तुम प्रवृत्त हुए थे, उसे तुम नहीं जानते हो। यदि यहाँ अमुख्य ब्रह्मके विज्ञानका भी निषेध किया गया होता तो 'इतनेही-