भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 450
४४४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| उताप्युच्चावचमुच्चं च देवत्वाद्यवचं च तिर्यक्त्वादि, उच्चमिवावचमिव च निगच्छति। मृषैव महाराजत्वादयोऽस्य लोकाः, इव-शब्दप्रयोगाद् व्यभिचारदर्शनाच्च। तस्मान्न बन्धुवियोगादिजनितशोकमोहादिभिः स्वप्ने सम्बध्यत एव। | ऊँची-नीची—ऊँची देवत्वादि और नीची तिर्यक्तत्वादि, इस प्रकार ऊँची-नीचीके सदृश [ गतियों ] को प्राप्त होता है। किंतु इसके ये महाराजत्वादि लोक मिथ्या ही हैं; क्योंकि इनके साथ 'इव' शब्दका प्रयोग किया गया है और [ स्वप्नेतर अवस्थाओंमें ] इनका व्यभिचार (त्याग) भी देखा जाता है। इसलिये स्वप्नावस्थामें बन्धुवियोगादिजनित शोक-मोहादिसे सम्बन्ध होता ही हो—ऐसी बात नहीं है। | | ननु च यथा जागरिते जाग्रत्कालाव्यभिचारिणो लोकाः, एवं स्वप्नेऽपि तेऽस्य महाराजत्वादयो लोकाः स्वप्नकालभाविनः स्वप्नकालाव्यभिचारिण आत्मभूता एव, न त्वविद्याध्यारोपिता इति। | पूर्व०-किंतु जिस प्रकार जागरित अवस्थाके कर्मफल जाग्रत्-कालमें व्यभिचरित होनेवाले नहीं होते, उसी प्रकार वे स्वप्नकालमें होनेवाले कर्मफल स्वप्नकालमें अव्यभिचारी और आत्मस्वरूप ही होते हैं; वे अविद्यासे आरोपित नहीं होते। | | ननु च जाग्रत्कार्यकरणात्मत्वं देवतात्मत्वं चाविद्याध्यारोपितं न परमार्थत इति व्यतिरिक्तविज्ञानमयात्मप्रदर्शनेन प्रदर्शितम्। | सिद्धान्ती-परंतु जाग्रत्कालका भी देहेन्द्रियात्मत्व और देवतात्मत्व अविद्यासे आरोपित ही है, परमार्थतः नहीं है—यह बात विज्ञानमय आत्माको प्राणादिव्यतिरिक्त प्रदर्शित करके दिखा दी गयी है। ऐसी |