भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 451
ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४४५
संस्कृत मूल / भाष्यहिन्दी अनुवाद
तत्कथं दृष्टान्तत्वेन स्वप्नलोकस्य मृत इवोज्जीविष्यन्प्रादुर्भाविष्यति?स्थितिमें वह (जाग्रत्कर्मफल) पुनरुज्जीवित होनेवाले मृतकके समान स्वप्नगत कर्मफलका दृष्टान्त बननेके लिये किस प्रकार प्रादुर्भूत हो सकता है?¹
सत्यम्, विज्ञानमये व्यतिरिक्ते कार्यकारणदेवतात्मत्वप्रदर्शनम् अविद्याध्यारोपितम्—शुक्तिकायामिव रजतत्वदर्शनम्—इत्येतत्सिद्ध्यति व्यतिरिक्तात्मास्तित्वप्रदर्शनन्यायेनैव, न तु तद्विशुद्धिपरतयैव न्याय उक्तः; इत्यसन्नपि दृष्टान्तो जाग्रत्कार्यकरणदेवतात्मत्वदर्शनलक्षणः पुनरुद्भाव्यते । सर्वो हि न्यायः किञ्चिद्विशेषमपेक्षमाणोऽपुनरुक्तीभवति ।पूर्व०—ठीक है, आत्मा प्राणादि व्यतिरिक्त है—यह प्रदर्शन करनेके लिये प्रयोग किये हुए न्यायसे ही विज्ञानमयके अतिरिक्त सिद्ध होनेपर कार्य-करण-देवतात्मप्रदर्शन शुक्तिमें रजतदर्शनके समान अविद्याध्यारोपित है—यह सिद्ध हो जाता है; किंतु वह न्याय आत्माकी विशुद्धि सिद्ध करनेके लिये [अर्थात् आत्मासे भिन्न अन्य सारा प्रपञ्च मिथ्या है—यह सिद्ध करनेके लिये] ही नहीं कहा गया; इसलिये असत् होनेपर भी इस जाग्रत् कार्य-करण-देवतात्मरूप दृष्टान्तकी पुनः उद्भावना की जाती है । सभी न्याय कुछ विशेषताकी अपेक्षा रखनेपर अपुनरुक्त माने जाते हैं ।
न तावत्स्वप्नेऽनुभूतमहाराजत्वादयो लोका आत्मभूताः; आत्म-सिद्धान्ती—किंतु स्वप्नमें अनुभव होनेवाले महाराजत्वादि कर्मफल अपने स्वरूपसे हैं भी तो नहीं,

१. अर्थात् यदि जाग्रत्कालिक कर्मफल स्वयं ही अविद्याध्यारोपित है तो उसके दृष्टान्तद्वारा स्वाप्न प्रपञ्चका सत्यत्व कैसे सिद्ध किया जा सकता है ?