भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 453

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४४७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
णभृतान्भृत्यानन्यांश्च गृहीत्वोपादाय स्व आत्मीय एव जयादिनोपार्जिते जनपदे यथाकामं यो यः कामोऽस्य यथाकाममिच्छातो यथा परिवर्तेतेत्यर्थः; एवमेवैष विज्ञानमयः, एतदिति क्रियाविशेषणम्, प्राणान्गृहीत्वा जागरितस्थानेभ्य उपसंहृत्य स्वे शरीरे स्व एव देहे न बहिः यथाकामं परिवर्तते; कामकर्मभ्यामुद्भासिताः पूर्वानुभूतवस्तुसदृशीर्वासना अनुभवतीत्यर्थः। तस्मात्स्वप्ने मृषाध्यारोपिता एवात्मभूतत्वेन लोका अविद्यमाना एव सन्तः, तथा जागरितेऽपि, इति प्रत्येत्तव्यम्। तस्माद्विशुद्धोऽक्रियाकारकफलात्मको विज्ञानमय इत्येतत्सिद्धम्। यस्माद् दृश्यन्ते द्रष्टुर्विषयभूताः क्रियाकारकफलात्मकाः कार्यकारणलक्षणा लोकाः, तथा स्वप्नेऽपि, तस्मादन्योऽसौपरिकररूप सेवक तथा अन्य सबको लेकर अपने जयादिद्वारा प्राप्त किये देशमें जिस प्रकार यथाकाम—इसकी जैसी-जैसी इच्छा होती है उसके अनुसार यथेच्छ विचरता है—ऐसा इसका तात्पर्य है; इसी प्रकार यह विज्ञानमय प्राणोंको ग्रहणकर—जागरित विषयोंसे हटाकर स्वशरीरमें—अपने ही देहमें, बाहर नहीं, यथेच्छ विचरता है; अर्थात् काम और कर्मोंसे उद्भासित पूर्वानुभूत वस्तुओंके समान रूपवाली वासनाओंका अनुभव करता है। मूलमें 'एतत्' शब्द क्रियाविशेषण है। अतः आत्मस्वरूपसे अविद्यमान ही होनेके कारण स्वप्नावस्थामें जो कर्मफल होते हैं, वे मिथ्या ही हैं, इसी प्रकार जागरित-अवस्थामें भी वे मिथ्या हैं—ऐसा जानना चाहिये। इसलिये यह सिद्ध होता है कि जो क्रिया, कारक और फलरूप नहीं है, वह विज्ञानमय विशुद्ध ही है। क्योंकि क्रिया, कारक एव फलरूप कार्यकरणात्मक लोक (देहेन्द्रियसंघातरूप कर्मफल) द्रष्टाके विषयभूत ही देखे जाते हैं और वैसे ही वे स्वप्नमें भी होते हैं। अतः इन स्वप्न और