भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 454
४४८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
दृश्येभ्यः स्वप्नजागरितलोकेभ्यो <br> द्रष्टा विज्ञानमयो विशुद्धः ॥१८॥जागरितके दृश्यभूत कर्मफलोंसे <br> विज्ञानमय द्रष्टा भिन्न और विशुद्ध <br> है ॥ १८ ॥

सुषुप्तिका स्वरूप

दर्शनवृत्तौ स्वप्ने वासनाराशे- <br> दृश्यत्वादतद्धर्मतेति विशुद्धताव- <br> गता आत्मनः । तत्र यथाकामं <br> परिवर्तत इति कामवशात्परिवर्तन- <br> मुक्तम् । द्रष्टुर्दृश्यसम्बन्धश्चास्य <br> स्वाभाविक इत्यशुद्धता शङ्क्यते; <br> अतस्तद्विशुद्धयर्थमाह—स्वप्नदर्शनवृत्तिमें वासनाराशि <br> दृश्यरूप होनेके कारण अनात्मधर्म है, <br> इससे आत्माकी विशुद्धता ज्ञात होती <br> है । उस अवस्था में वह यथेच्छ <br> विचरता है—इस प्रकार उसका <br> इच्छानुसार विचरना बतलाया गया। <br> किंतु द्रष्टाका यह दृश्यसे सम्बन्ध <br> स्वाभाविक है, इसलिये उसकी <br> अशुद्धताकी शङ्का की जाती है; अतः <br> उसकी विशुद्धता सिद्ध करनेके लिये <br> श्रुति कहती है—

अथ यदा सुषुप्तो भवति यदा न कस्यचन वेद हिता नाम नाड्यो द्वासप्ततिः सहस्राणि हृदयात्पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वातिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीतैवमेवैष एतच्छेते ॥ १९ ॥

इसके पश्चात् जब वह सुषुप्त होता है, जिस समय कि वह किसीके विषयमें—कुछ भी नहीं जानता, उस समय हिता नामकी जो बहत्तर हजार नाड़ियाँ हृदयसे सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त होकर स्थित हैं, उनके द्वारा बुद्धिके साथ जाकर वह शरीरमें व्याप्त होकर शयन करता है । वह जिस प्रकार कोई बालक अथवा महाराज किंवा महाब्राह्मण आनन्दकी दुःखनाशिनी अवस्था-को प्राप्त होकर शयन करे, उसी प्रकार यह शयन करता है ॥ १९ ॥