भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 456, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 456
४५०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| नाड्यः शिरा देहस्यान्नरसविपरिणामभूताः, ताश्च द्वासप्ततिः सहस्राणि, द्वे सहस्रे अधिके सप्ततिश्च सहस्राणि ता द्वासप्ततिःसहस्राणि, हृदयात्--हृदयं नाम मांसपिण्डः--तस्मान्मांसपिण्डात्पुण्डरीकाकारात् पुरीतातं हृदयपरिवेष्टनमाचक्षते, तदुपलक्षितं शरीरमिह पुरीत्तच्छब्देनाभिप्रेतम्--पुरीतमभिप्रतिष्ठन्त इति शरीरं कृत्स्नं व्याप्नुवन्त्योऽश्वत्थपर्णराजय इव बहिर्मुख्यः प्रवृत्ता इत्यर्थः । | रसकी विपरिणामभूता देहकी शिराएं हैं। वे 'द्वासप्ततिः सहस्राणि'—दो सहस्र अधिक सत्तर सहस्र अर्थात् बहत्तर सहस्र हैं, वे हृदयसे—हृदय नामका जो कमलके-से आकारवाला मांसपिण्ड है, उससे 'पुरीततम्'—पुरीतत् हृदयपरिवेष्टनको कहते हैं, यहाँ उससे उपलक्षित शरीर पुरीतत् शब्दसे अभिप्रेत है । अतः 'पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते' अर्थात् सम्पूर्ण शरीरको व्याप्त करती हुई बहिर्मुख होकर प्रवृत्त हैं, जैसे पीपलके पत्तेकी नसें बाहरकी ओर फैली रहती हैं । | | तत्र बुद्धेरन्तःकरणस्य हृदयं स्थानम्, तत्रस्थबुद्धितन्त्राणि चेतराणि बाह्यानि करणानि । तेन बुद्धिः कर्मवशाच्छ्रोत्रादीनि ताभिर्नाडीभिर्मत्स्यजालवत्कर्णशष्कुल्यादिस्थानेभ्यः प्रसारयति, प्रसार्य चाधितिष्ठति जागरितकाले । तां विज्ञानमयोऽभिव्यक्तस्वात्मचैतन्यावभासतया व्याप्नोति । सङ्कोचनकाले च तस्या अनुसङ्कुचति; सोऽस्य विज्ञानमयस्य स्वापः; जाग्रद्विकासानुभवो भोगः; | शरीरमें बुद्धि—अन्तःकरणका हृदय स्थान है, उसमें स्थित बुद्धिके अधीन अन्य बाह्य इन्द्रियाँ हैं । इसीसे बुद्धि कर्मवश श्रोत्रादि इन्द्रियोंको मत्स्यजालके समान उन नाडियोंद्वारा कर्णरन्ध्रादि स्थानोंसे बाहर फैलाती है, तथा उन्हें फैलाकर जागरित-अवस्था में उनकी अध्यक्ष होकर स्थित रहती है । उस बुद्धिको विज्ञानमय आत्मा अभिव्यक्तस्वात्मचैतन्यप्रकाशरूपसे व्याप्त कर लेता है, तथा संकुचित होनेके समय उसीके साथ संकुचित हो जाता है; वही इस विज्ञानमयका सोना है और जाग्रत्कालिक विकासका अनुभव |