भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 467, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 467
ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४६१
संस्कृतहिन्दी
प्येतन्महामोहस्थानम् अनुक्तप्रतिवचनप्रश्नविषयम्; अतो यथाशक्ति ब्रह्मविद्याप्रतिपादकवाक्येषु ब्रह्मविजिज्ञासूनां बुद्धिव्युत्पादनाय विचारयिष्यामः ।<br><br>न तावदसंसारी परः, पाणिपेषणप्रतिबोधिताच्छब्दादिभुजोऽवस्थान्तरविशिष्टादुत्पत्तिश्रुतेः । न प्रशासिताशनायादिवर्जितः परो विद्यते, कस्मात् ? यस्मात् 'ब्रह्म ज्ञापयिष्यामि' ( २ । १ । १५ ) इति प्रतिज्ञाय सुप्तं पुरुषं पाणिपेषं बोधयित्वा तं शब्दादिभोक्तृत्वविशिष्टं दर्शयित्वा तस्यैव स्वप्नद्वारेण सुषुप्त्याख्यमवस्थान्तरमुन्नीय तस्मादेवात्मनः सुषुप्त्यवस्थाविशिष्टाद् अग्निविस्फुलिङ्गोर्णनाभिदृष्टान्ताभ्यामुत्पत्तिं दर्शयति श्रुतिः “एवमेवास्मात्” (२ । १ । २०) इत्यादिना । न चान्यो जगदुत्पत्तिकारणमन्तराले श्रुतो-ऐकात्म्यविषयक प्रश्नका विषय पण्डितोंके लिये भी अत्यन्त मोहका स्थान है, इसलिये ब्रह्मजिज्ञासुओंकी बुद्धिको ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन करनेवाले वाक्योंमें प्रवृत्त करनेके लिये हम यथाशक्ति विचार करेंगे ।¹<br><br>इनमेंसे असंसारी (शुद्ध आत्मा) तो परमात्मा हो नहीं सकता; क्योंकि हाथ दबानेसे जगे हुए शब्दादिके भोक्ता एवं सुषुप्तिसंज्ञक अवस्थान्तरसे विशिष्ट जीवसे जगत्की उत्पत्ति सुनी गयी है । उससे भिन्न क्षुधादि जीवधर्मोंसे रहित शुद्ध ब्रह्म जगत्का शासक नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि 'मैं तुझे ब्रह्मका ज्ञान कराऊँगा' ऐसी प्रतिज्ञा कर हाथ दबानेके द्वारा सुषुप्त पुरुषको जगाकर उसे शब्दादिभोक्तृत्व-विशिष्ट दिखाकर, उसीकी स्वप्नके द्वारा सुषुप्तिसंज्ञक अवस्थान्तर प्रदर्शित कर श्रुति "एवमेवास्मात्"² इत्यादि वाक्यद्वारा सुषुप्तिअवस्थाविशिष्ट उस आत्मासे ही अग्नि-विस्फुलिङ्ग और ऊर्णनाभिके दृष्टान्तोंद्वारा जगत्की उत्पत्ति दिखलाती है। यहाँ बीचमें जगत्की उत्पत्तिका कोई दूसरा कारण सुना

१. इससे आगे पहले पूर्वपक्षकी बात कहते हैं ।
२. इसी प्रकार इससे ।