भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 478
४७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्वादेकत्वमुपचारितमेव न तु परमार्थतः । तथा च सति सिद्धान्तविरोधः ।(परमात्मा और विज्ञानात्मा) का एकत्व उपचारसे ही होगा, परमार्थतः नहीं । ऐसा माननेपर सिद्धान्तसे विरोध आवेगा ।
अथ नित्यायुतसिद्धावयवानुगतोऽवयवी पर आत्मा, तस्य तदवस्थस्यैकदेशो विज्ञानात्मा संसारी--तदापि सर्वावयवानुगतत्वादवयविन एवावयवगतो दोषो गुणो वेति, विज्ञानात्मनः संसारित्वदोषेण पर एवात्मा सम्बध्यत इति, इयमप्यनिष्टा कल्पना ।और यदि परमात्मा नित्य अयुतसिद्ध अवयवोंमें अनुगत अवयवी है और उसी रूपमें स्थित हुए उस परमात्माका एकदेश संसारी विज्ञानात्मा है तो उस अवस्था में भी अवयवगत गुण या दोष समस्त अवयवोंमें अनुगत होनेके कारण अवयवीमें ही रहेगा; इस प्रकार विज्ञानात्माके संसारित्वरूप दोषसे परमात्माका ही सम्बन्ध सिद्ध होता है । अतः यह कल्पना भी इष्ट नहीं हो सकती ।
क्षीरवत्सर्वपरिणामपक्षे सर्वश्रुतिस्मृतिकोपः, स चानिष्टः । "निष्कल निष्क्रियं शान्तम्” (श्वे० उ० ६ । १९) "दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु०उ० २ । १ । २) "आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः” “स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतः”(बृ० उ० ४ । ४ । २५) "न जायते म्रियते वा कदाचित्” (गीता २ । २०) "अव्यक्तोऽयम्” (गीता २।२५) इत्यादिदुग्धके समान सम्पूर्ण परमात्माका परिणाम माननेके पक्षमें भी समस्त श्रुति-स्मृतियोंसे विरोध होता है और यह इष्ट नहीं है । अतः ये सब पक्ष "निष्कल, निष्क्रिय और शान्त है” 'पुरुष दिव्य, अमूर्त, बाहर-भीतर विद्यमान और अजन्मा है” “वह आकाशके समान सर्वगत और नित्य है”, “वह यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमर एवं अमृत है”, "वह न कभी उत्पन्न होता है और न मरता है”, वह "अव्यक्त है”