बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 501, कुल 1402 में से
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| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९५ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| इति; अथ न विरुध्यते, न तर्हि प्रत्यक्षविरोधः। | विरोध नहीं है तो प्रत्यक्ष प्रमाणसे [ब्रह्मैकत्व प्रतिपादन करनेवाले वाक्योंका] विरोध नहीं हो सकता। |
| यच्चोक्तं प्रतिशरीरं शब्दाद्युपलब्धारो धर्माधर्मयोश्च कर्तारो भिन्ना अनुमीयन्ते, तथा च ब्रह्मैकत्वेऽनुमानविरोध इति; भिन्नाः कैरनुमीयन्त इति प्रष्टव्याः; अथ यदि ब्रूयुः—सर्वैरस्माभिरनुमानकुशलैरिति—के यूयमनुमानकुशला इत्येवं पृष्टानां किमुत्तरम्। | और ऐसा जो कहा कि प्रत्येक शरीरमें शब्दादिको उपलब्ध करनेवाले तथा धर्माधर्मका अनुष्ठान करनेवाले भी भिन्न-भिन्न ही अनुमान किये जाते हैं, इसलिये ब्रह्मकी एकता माननेपर अनुमानप्रमाणसे विरोध होगा, सो यह पूछना चाहिये कि वे भिन्न-भिन्न हैं—इसका अनुमान कौन करता है ? इसपर यदि वे कहें कि अनुमान करनेमें कुशल हम सब लोग ही इसका अनुमान करते हैं, तो 'अनुमान करनेमें कुशल तुम कौन हो ?' इस प्रकार पूछे जानेपर तुम्हारा क्या उत्तर होगा ? |
| शरीरेन्द्रियमनआत्मसु च प्रत्येकमनुमानकौशलप्रत्याख्याने, शरीरेन्द्रियमनःसाधना आत्मानो वयमनुमानकुशलाः, अनेककारकसाध्यत्वात्क्रियाणामिति चेत् ? | पूर्व०-शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मामेंसे क्रमशः एक-एकमें अनुमानकौशलका निषेध किये जानेपर जो शरीर, इन्द्रिय और मनरूप साधनोंवाले हम आत्मा हैं, वे ही अनुमान करनेमें कुशल हैं, क्योंकि क्रियाएँ अनेक कारकोंद्वारा साध्य होती हैं, ऐसा कहें तो ? |
| एवं तर्ह्यनुमानकौशलेभवतामनेकत्वप्रसङ्गः; अनेककारकसाध्या | सिद्धान्ती-यदि ऐसी बात है, तब तो अनुमानकी कुशलतामें तो तब आपकी अनेकता का प्रसङ्ग उपस्थित होता है। क्रिया अनेक कारकों- |