बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 505, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९९
| तस्मात्तार्किकचाटभटराजाप्रवेश्यम् अभयं दुर्गमिदमल्पबुद्धथगम्यं शास्त्रगुरुप्रसादरहितैश्च, "कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति" (क० उ० १।२।२१) "देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा" (क० उ० १।१।२१) "नैषा तर्केण मतिरापनेया" (क० उ० | पुरुषोंके लिये अगम्य और शास्त्र एवं गुरुकी कृपासे रहित पुरुषोंद्वारा दुर्भेद्य अभय दुर्ग तार्किक-चाटभट-राजोंके¹ लिये प्रवेशयोग्य नहीं है। "उस सहर्ष और हर्षरहित देवको मेरे सिवा और कौन जान सकता है ?" "इस विषयमें पूर्वकालमें देवताओोंने भी संदेह किया था," "यह बुद्धि तर्कद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं |
उपदेशरूप क्रिया भी अनेक कारकोंद्वारा साध्य होनेके कारण एकत्वका उपदेश उत्पन्न नहीं हो सकता। दूसरा अभिप्राय यह हो सकता है कि जब ब्रह्म एक और नित्य मुक्तस्वरूप है तो उसमें कभी भी द्वैतरूप बन्धन न होनेके कारण मुक्तिके लिये एकत्वका उपदेश निरर्थक है। इनमेंसे पहले अभिप्रायके अनुसार एकत्वके उपदेशको निरर्थक बताया गया है—ऐसा यदि कोई कहे तो उसके विरोधमें सिद्धान्ती कहता है—'तदपि न' इत्यादि। अर्थात् उक्त अभिप्रायसे एकत्वोपदेशको निरर्थक नहीं बताया जा सकता; क्योंकि क्रियाएँ तो अनेक कारकोंद्वारा निष्पन्न होनेवाली हैं ही, इसके लिये किससे प्रश्न किया जाय—कौन उत्तरदायी होगा ? इस अनेकताको ही दूर करनेके लिये तो एकत्वका उपदेश होता है, अतः वह असंगत नहीं हो सकता। यदि दूसरे अभिप्रायके अनुसार अर्थात् ब्रह्मके नित्यमुक्त होनेके कारण उक्त उपदेशकी व्यर्थता बतायी गयी हो तो यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मका ज्ञान हो जानेके बाद उक्त उपदेशकी व्यर्थता सिद्ध होती है या पहले ? यदि कहें बाद ही उसकी व्यर्थता है, तो इसको स्वयं भी स्वीकार करते हुए सिद्धान्ती कहता है—'एकस्मिन् ब्रह्मणि' इत्यादि। अर्थात् सब प्रकारकी उपाधियोंसे रहित एकमात्र ब्रह्ममें उपदेश, उपदेशक और उपदेशग्रहणका फल—यह कुछ भी नहीं है, इसलिये केवल एकत्वका उपदेश ही नहीं समस्त उपनिषदें ही उस अवस्थामें निरर्थक हैं और इसे हम भी स्वीकार करते ही हैं। यदि कहें 'ब्रह्मज्ञानके पहले भी एकत्वका उपदेश व्यर्थ है; क्योंकि यह अनेक कारकोंद्वारा साध्य होनेवाला है' तो ठीक नहीं, कारण कि अपनी मान्यताके विरुद्ध है। ज्ञानके पहले अविद्याकी निवृत्तिके लिये सभी आत्मज्ञानी एकत्वोपदेशकी सार्थकता स्वीकार करते हैं।
१. चाट=आर्यमर्यादाको तोड़नेवाले; भट=मिथ्यावादी।