भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 511

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५०५


| यथा वत्सः स्थूणावष्टम्भ एवं शरीरपक्षपाती वायुः प्राणः स्थूणेति केचित् ।<br><br>अन्नं दाम—अन्नं हि भुक्तं त्रेधा परिणमते; यः स्थूलः परिणामः, स एतद्द्वयं भूत्वा इमामप्येति— मूत्रं च पुरीषं च । यो मध्यमो रसः स रसो लोहितादिक्रमेण स्वकार्यं शरीरं सप्तधातुकमुपचिनोति; स्वयोन्यन्नागमे हि शरीरमुपचीयतेऽन्नमयत्वात्; विपर्ययेऽपचीयते पतति; यस्त्वणिष्ठोरसः-अमृतम् ऊर्क् प्रभावः—इति च कथ्यते, स नाभेरूर्ध्वं हृदयदेशमागत्य, हृदयाद्विप्रसृतेषु द्वासप्ततिनाडीसहस्रेष्वनुप्रविश्य यत्तत्करणसङ्घातरूपं लिङ्गं शिशुसंज्ञकम्, तस्य | जिस प्रकार बछड़ा स्थूणा (खूँटे) के आश्रित होता है, उसी प्रकार शरीरपक्षपाती वायु-प्राण स्थूणा है—ऐसा किन्हींकाँ मत है।<br><br>अन्न दाम (बन्धन—रज्जु) है, क्योंकि भोजन किये जानेपर अन्न तीन प्रकारसे परिणामको प्राप्त हो जाता है। उसका जो स्थूल परिणाम होता है, वह मल और मूत्र दो रूपमें होकर इस भूमिको प्राप्त होता है। जो मध्यम परिणाम होता है वह रस है। वह रस लोहितादि क्रमसे अपने कार्यभूत सात धातुओंवाले शरीरको पुष्ट करता है। शरीर अन्नमय है, इसलिये अपने कारणभूत अन्नके आनेपर उसकी पुष्टि होती है, तथा उसके विपरीत होनेपर क्षीण होकर गिर जाता है। तथा जो सूक्ष्मतम रस होता है वह अमृत—ऊर्क् अथवा प्रभाव ऐसा कहा जाता है; वह नाभिसे ऊपर हृदयदेशमें आकर हृदयसे फैली हुई बहत्तर सहस्र नाड़ियोंमें प्रवेश कर स्थूणासंज्ञक बलको उत्पन्न करके जो शिशुसंज्ञक इन्द्रियसंघातरूप लिङ्गशरीर है, उसकी |


१. शरीरपक्षपाती वायुसे श्वासोच्छ्वास करनेवाला शरीरान्तर्वर्ती प्राण समझना चाहिये। उसके अधीन ही इन्द्रियाभिमानी प्राण ग्रहण किया जाता है, इसलिये यह उसके खूँटे (बन्धनस्थान) के समान है।
२. भर्तृप्रपञ्च आदिका।