भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 512, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 512
५०६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| शरीरे स्थितिकारणं भवति बलमुपजनयत्स्थूणाख्यम्; तेनान्नमुभयतः पाशवत्सदामवत् प्राणशरीरयोर्निबन्धनं भवति ॥१॥ | शरीरमें स्थिति रखनेका कारण होता है। इसीसे, जिसके दोनों ओर पाश हैं, ऐसी बछड़ा बाँधनेकी रस्सीके समान अन्न प्राण और शरीरका बन्धन है ॥ १ ॥ |


मध्यम प्राणरूप शिशुके नेत्रान्तर्गत सात अक्षितियाँ

इदानीं तस्यैव शिशोः प्रत्याधान ऊढस्य चक्षुषि काश्चनोपनिषद उच्यन्ते—अब प्रत्याधानमें आरूढ उसी शिशुके नेत्रमें कुछ उपनिषदें बतलायी जाती हैं—

तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्षन्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनꣳ रुद्रोऽन्वायत्तोऽथ या अक्षन्नापस्ताभिः पर्जन्यो या कनीनका तयादित्यो यत्कृष्णं तेनाग्निर्यच्छुक्लं तेनेन्द्रोऽधरयैनं वर्तन्या पृथिव्यन्वायत्ता द्यौरुत्तरया नास्यान्नं क्षीयते य एवं वेद ॥२॥

उसका ये सात अक्षितियाँ उपस्थान ( स्तवन ) करती हैं—उनमेंसे जो ये आँखमें लाल रेखाएँ हैं, उनके द्वारा रुद्र इस मध्यप्राणके अनुगत है और नेत्रमें जो जल है उसके द्वारा मेघ, जो कनीनका ( दर्शनशक्ति ) है उसके द्वारा आदित्य, जो कालिमा है उसके द्वारा अग्नि और जो शुक्लता है उसके द्वारा इन्द्र अनुगत है । नीचेके पलकद्वारा पृथिवी इसके अनुगत है एवं ऊपरके पलकद्वारा द्युलोक । जो इस प्रकार जानता है, उसका अन्न क्षीण नहीं होता ॥ २ ॥

तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते—<br><br>तं करणात्मकं प्राणं शरीरेऽन्न-उसमें ये सात अक्षितियाँ उपस्थान करती हैं—शरीरमें अन्नके कारण रहनेवाले नेत्रस्थानमें आरूढ़ उस
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