भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 513, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 513

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५०७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
बन्धनं चक्षुष्यूढमेता वक्ष्यमाणाः सप्त सप्तसङ्ख्याका अक्षितयोऽक्षितिहेतुत्वादुपतिष्ठन्ते। यद्यपि मन्त्रकरणे तिष्ठतिरूपपूर्व आत्मनेपदी भवति, इहापि सप्त देवताभिधानांनि मन्त्रस्थानीयानि करणानि; तिष्ठतेरतोऽत्राप्यात्मनेपदं न विरुद्धम्।इन्द्रियरूप प्राणमें ये आगे कही जानेवाली सात—सात संख्यावाली अक्षितियां जो अक्षिति (अक्षयता) का कारण होनेके कारण अक्षिति कहलाती हैं, रहती हैं। यद्यपि [उपान्मन्त्रकरणे (पा० सू० १। ३। २५) इस पाणिनिसूत्रके अनुसार] 'उप' पूर्वक 'स्था' धातु मन्त्रकरण अर्थमें आत्मनेपदी होता है, तथापि यहाँ भी रुद्रादि सप्त-देवतासंज्ञक करण मन्त्रस्थानीय ही हैं, इसलिये यहाँ भी उपपूर्वक 'स्था' धातुमें आत्मनेपद रहना विरुद्ध नहीं है।
कास्ता अक्षितयः? इत्युच्यन्ते—तत्तत्र या इमाः प्रसिद्धाः, अक्षन्नक्षणि लोहिन्यो लोहिता राजयो रेखाः, ताभिर्द्वारभूताभिरेनं मध्यं प्राणं रुद्रोऽन्वायत्तोऽनुगतः; अथ या अक्षन्नक्षण्यापो धूमादिसंयोगेनाभिव्यज्यमानाः, ताभिरद्भिर्द्वारभूताभिः पर्जन्यो देवतात्मान्वायत्तोऽनुगतः उपतिष्ठत इत्यर्थः। स चान्नभूतोऽक्षितिः प्राणस्य; “पर्जन्ये वर्षत्यानन्दिनः प्राणा भवन्ति” इति श्रुत्यन्तरात्।वे अक्षितियाँ कौन-सी हैं? सो बतलायी जाती हैं—उनमें ये जो नेत्रके भीतर लोहित वर्णकी प्रसिद्ध राजियाँ—रेखाएँ हैं, उन द्वारभूता रेखाओंके द्वारा रुद्र इस मध्यम प्राणके अनुगत है। तथा नेत्रमें जो धूमादिके संयोगसे अभिव्यक्त होनेवाला जल है, उस द्वारभूत जलके द्वारा देवस्वरूप मेघ इसके अनुगत है। वह प्राणका अन्नभूत अक्षिति है जैसा कि “मेघके बरसनेपर प्राण आनन्दित हो जाते हैं” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है।
या कनीनका दृक्शक्तिस्तयाजो कनीनका अर्थात् दर्शन-शक्ति