भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 524, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 524
५१८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| अथामूर्तम्— अथाधुनामूर्तमुच्यते। वायुश्चान्तरिक्षं च यत्परिशेषितं भूतद्वयम्—एतदमृतम्, अमूर्तत्वात्; अस्थितम्, अथोऽविरुद्धयमानं केनचित्, अमृतममरणधर्मि। एतद्यत्स्थितविपरीतम्,व्यापि, अपरिच्छिन्नम्, यस्मात् 'यत्' एतद् अन्येभ्योऽप्रविभज्यमानविशेषम्, अतस्त्यत्, 'त्यत्' इति परोक्षाभिधानार्हमेव--पूर्ववत्। | अब अमूर्तका वर्णन किया जाता है। वायु और अन्तरिक्ष जो दो भूत रह गये हैं, वे अमृत हैं; क्योंकि वे अमूर्त हैं तथा अमूर्त होनेके कारण ही वे अस्थित हैं। अतः किसीसे भी उनका विरोध नहीं है, अमृत कहते हैं अमरणधर्मीको, यह यत् (चल) अर्थात् स्थितसे विपरीत व्यापी यानी अपरिच्छिन्न है, चूँकि दूसरोंसे इस 'यत्' के विशेषण विभक्त नहीं हैं, इसलिये यह 'त्यत्' है, अर्थात् 'त्यत्' इस प्रकार पूर्ववत् परोक्षरूपसे ही पुकारे जाने योग्य है। | | तस्यैतस्यामूर्तस्य तस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्य चतुष्टयविशेषणस्यामूर्तस्यैष रसः;कोऽसौ? | उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत् (गतिशील) का और इस त्यत् (परोक्ष) का अर्थात् इन चार विशेषणोंसे युक्त अमूर्तका यह रस है। वह कौन है? | | य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः— करणात्मको हिरण्यगर्भः प्राण इत्यभिधीयते यः, स एषोऽमूर्तस्य भूतद्वयस्य रसः पूर्ववत्सारिष्ठः। | जो कि यह इस मण्डलमें पुरुष यानी इन्द्रियात्मा हिरण्यगर्भ यानी प्राण—ऐसा कहा जाता है। वही इस अमूर्त भूतद्वयका रस अर्थात् पूर्ववत् सारतम भाग है। | | एतत्पुरुषसारं चामूर्तं भूतद्वयम्--<br>हैरण्यगर्भलिङ्गारम्भाय हि भूतद्वयाभिव्यक्तिरव्याकृतात्। तस्मात्तादर्थ्यात्तत्सारं भूतद्वयम्। | अमूर्त भूतद्वय इस पुरुषरूप सारवाले हैं। हिरण्यगर्भरूप लिङ्गात्माके आरम्भके लिये ही अव्याकृतसे इन दोनों भूतोंकी अभिव्यक्ति होती है। अतः उसके लिये अर्थात् उसके साधन होनेसे ये भूतद्वय उस पुरुष- |

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