भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 525, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 525
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ५१९
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
त्यस्य ह्येष रसः--यस्माद्यो मण्डलस्थः पुरुषो मण्डलवन्न गृह्यते सारश्च भूतद्वयस्य, तस्मादस्ति मण्डलस्थस्य पुरुषस्य भूतद्वयस्य च साधर्म्यम्, तस्माद्युक्तं प्रसिद्धवद्धेतूपादानम्--त्यस्य ह्येष रस इति।रूप सारवाले ही हैं। यह त्यत्का ही सार है; क्योंकि यह जो मण्डलस्थ पुरुष है, इसे मण्डलके समान ग्रहण नहीं किया जा सकता; इसलिये यह भूतद्वयका सार है; अतः मण्डलस्थ पुरुष और इन दोनों भूतोंका साधर्म्य है, अतः 'यह त्यत्का ही सार है' इस प्रकार प्रसिद्धके समान [ त्यत्को इसका ] हेतु बतलाना उचित ही है।
रसः कारणं हिरण्यगर्भविज्ञानात्मा चेतन इति केचित्। तत्र च किल हिरण्यगर्भविज्ञानात्मनः कर्म वाय्वन्तरिक्षयोः प्रयोक्तृ, तत्कर्म वाय्वन्तरिक्षाधारं सदन्येषां भूतानां प्रयोक्तृ भवति; तेन स्वकर्मणा वाय्वन्तरिक्षयोः प्रयोक्तेति तयो रसः कारणमुच्यत इति।किन्हींका मत है¹ कि हिरण्यगर्भविज्ञानात्मा चेतन रस यानी कारण है। उस अवस्थामें हिरण्यगर्भविज्ञानात्माका कर्म वायु और अन्तरिक्षका प्रेरक है, वह कर्म वायु और अन्तरिक्षरूप आधारवाला होकर अन्य भूतोंका प्रेरक होता है; उस अपने कर्मके द्वारा हिरण्यगर्भविज्ञानात्मा वायु और अन्तरिक्षका प्रेरक है, इसलिये उनका रस यानी कारण कहा जाता है।
तन्न, मूर्तरसेनातुल्यत्वात्। <br><br> मूर्तस्य तु भूतत्रयस्य रसो मूर्तमेव मण्डलं दृष्टं भूतत्रयसमानजातीयम्, न चेतनः; तथामूर्तयोरपि भूत-किंतु ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि मूर्तके रस (सार) से इसकी सदृशता नहीं है। तीन मूर्त भूतोंका रस तो मूर्तमण्डल ही देखा गया है, जो भूतत्रयसे समान जातिवाला अर्थात् जड है, उनका रस चेतन नहीं है। इसी प्रकार अमूर्त भूतोंका

१. भर्तृप्रपञ्चका।