भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 526, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 526
५२०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| योस्तत्समानजातीयेनैवामूर्तरसेन युक्तं भवितुम्; वाक्यप्रवृत्तेस्तुल्यत्वात्; यथा हि मूर्तामूर्ते चतुष्टयधर्मवती विभज्येते, तथा रसरसवतोरापि मूर्तामूर्तयोस्तुल्येनैव न्यायेन युक्तो विभागः, न त्वर्धवैशसम् । | भी उनके समानजातीय ही अमूर्त रस होना चाहिये¹; क्योंकि इन दोनों वाक्योंकी प्रवृत्ति समान ही है। जिस प्रकार चार धर्मोंसे युक्त मूर्त और अमूर्तका विभाग किया गया है² उसी प्रकार उसी न्यायसे मूर्तरसवान् और रस तथा अमूर्त्त रसवान् और रसका भी विभाग करना उचित है³; अर्धजरतीय न्यायका आश्रय लेना उचित नहीं है। | | मूर्तरसेऽपि मण्डलोपाधिश्चेतनो विवक्ष्यत इति चेत् ? | पूर्व०—[जिस प्रकार हम अमूर्त भूतोंके रसको चेतन मानते हैं, उसी प्रकार] यदि मूर्तभूतोंके रसमें भी मण्डलोपाधिक चेतन ही विवक्षित मानें तो ? | | अत्यल्पमिदमुच्यते, सर्वत्रैव तु मूर्तामूर्तयोर्ब्रह्मरूपेण विवक्षितत्वात् । | सिद्धान्ती—तुम्हारा यह कथन बहुत थोड़ा है, क्योंकि यहाँ [ मूर्त और अमूर्त रस ही नहीं] सर्वत्र ही मूर्त और अमूर्त भूतमात्र ब्रह्मरूपसे विवक्षित हैं। |


१. अर्थात् जिस प्रकार अमूर्त भूत—वायु और अन्तरिक्ष जड जातिके हैं, उसी प्रकार उनका रस भी अमूर्त एवं जड होना उचित है।
२. जैसे कि मन्त्र २ और ३ में यह बतलाया है कि ब्रह्मका मूर्त रूप 'मूर्तिमान्, मर्त्य, स्थित (परिच्छिन्न) और सत् है तथा अमूर्त रूप अमूर्तिमान्, अमृत, अस्थित (अपरिच्छिन्न) और त्यत् है।
३. जैसे रसवान् (भूत) मूर्त और अमूर्त दो प्रकारके हैं, तथा जड हैं, उसी प्रकार रस भी मूर्त और अमूर्त—दो प्रकारका तथा जड होना चाहिये। ऐसा विभाग नहीं करना चाहिये कि मूर्त रस तो जड है और अमूर्त रस चेतन है। क्योंकि ऐसी कल्पना अर्धजरतीय होगी, जो अनुचित है।