भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 532, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 532

| ५२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ | | :--- | :--- |


| कर्मराशिः, प्रयोज्यः पूर्वोक्तो मूर्तामूर्तभूतराशिः साधनं चेति । तत्र च तार्किकैः सह सन्धिं कुर्वन्ति । लिङ्गाश्रयश्चैष कर्मराशिरित्युक्त्वा पुनस्ततस्त्रस्यन्तः साङ्ख्यत्वभयात्, सर्वः कर्मराशिः—पुष्पाश्रय इव गन्धः पुष्पवियोगेऽपि पुटतैलाश्रयो भवति तद्वत्—लिङ्गवियोगेऽपि परमात्मैकदेशमाश्रयति, स परमात्मैकदेशः किलान्यत आगतेन गुणेन कर्मणा सगुणो भवति निर्गुणोऽपि सन्, स कर्ता भोक्ता बध्यते मुच्यते च विज्ञानात्मा—इति वैशेषिकचित्तमप्यनुसरन्ति, स च कर्मराशिर्भूतराशेरागन्तुकः, स्वतो निर्गुण एव परमात्मैकदेशत्वात्; स्वत उत्थिता अविद्या अनागन्तुकाप्यूषरवदनात्मधर्मः—इत्यनया | समुदाय प्रयोजक है तथा पूर्वोक्त मूर्त्तामूर्त्तभूतराशि एवं ज्ञान-कर्मके साधन (कार्य-कारणसमूह) प्रयोज्य हैं। इस प्रकार तीन राशिकी कल्पना कर लेनेके पश्चात् वे तार्किकोंके साथ सन्धि कर लेते हैं। और यह कर्मराशि लिङ्गदेहके आश्रित है, ऐसा कहकर फिर उससे सांख्य-सिद्धान्त हो जानेके डरसे डरते हुए ऐसा कहने लगते हैं कि जिस प्रकार पुष्पके आश्रय रहनेवाला गन्ध पुष्पके न रहनेपर भी पुड़िया या तैलके आश्रित रहता है उसी प्रकार सम्पूर्ण कर्मराशि, लिङ्गदेहका वियोग होनेपर भो, परमात्माके एक देशको आश्रय करती है और परमात्माका वह एक देश अन्यसे प्राप्त हुए उस गुणरूप कर्मके द्वारा, निर्गुण होनेपर भी सगुण हो जाता है; तथा वह विज्ञानात्मा कर्ता भोक्ता ही बद्ध या मुक्त होता है—इस प्रकार वे वैशेषिकोंके चित्तका भी अनुसरण करते हैं। भूतराशिसे आनेवाली वह कर्मराशि स्वतः निर्गुण ही है; क्योंकि वह परमात्माका ही एक देश है। स्वयं उत्पन्न हुई अविद्या अनागन्तुका होनेपर भी [ पृथिवीके धर्म ] ऊसरके समान अनात्माका धर्म है। इस प्रकार इस |