बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 545, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 545
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३९
| संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वाक्यस्य व्याख्यानविषये सम्बन्धप्रयोजने अभिहिते—'तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत्' (१ । ४ । १०) इति; एवं प्रत्यगात्मा ब्रह्मविद्याया विषय इत्येतदुपन्यस्तम् । | वाक्यके व्याख्यानविषयक सम्बन्ध और प्रयोजनका 'उसने आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ, इसलिये वह सर्वरूप हो गया' इस वाक्यमें वर्णन किया है। इस प्रकार यह बात दिखायी गयी है कि प्रत्यगात्मा ब्रह्मविद्याका विषय है। |
| अविद्यायाश्च विषय:--'अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद' (१ । ४ । १०) इत्यारभ्य चातुर्वर्ण्यप्रविभागादिनिमित्तपाङ्क्तकर्मसाध्यसाधनलक्षणो बीजाङ्कुरवद्व्याकृताव्याकृतस्वभावो नामरूपकर्मात्मक: संसार: 'त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म' (१ । ६ । १) इत्युपसंहृतः । शास्त्रीय उत्कर्षलक्षणो ब्रह्मलोकान्तोऽधोभावश्च स्थावरान्तोऽशास्त्रीय: पूर्वमेव प्रदर्शित:--'द्वया ह' (१ । ३ । १) इत्यादिना । एतस्मादविद्याविषयाद्विरक्तस्य प्रत्यगात्मविषयब्रह्मविद्यायामधिकार: कथं नाम स्यादिति—तृतीयेऽध्याये उपसंहृतः समस्तोऽविद्याविषयः । | इसी प्रकार जो चातुर्वर्ण्यादि विभागके निमित्तभूत पाङ्क्तकर्मरूप साध्यसाधनवाला और बीजाङ्कुरके समान व्यक्ताव्यक्तरूप है, उस अविद्याके विषयभूत नाम रूप-कर्ममय संसारका 'यह अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है वह नहीं जानता' यहाँसे आरम्भ करके 'यह नाम, रूप और कर्म त्रयरूप हे' इस प्रकार उपसंहार किया है। इसके सिवा ब्रह्मलोकपर्यन्त उत्कर्षरूप शास्त्रीय भाव और स्थावरपर्यन्त अशास्त्रीय अधोभावका भी 'देव और असुर ये दो प्राजापत्य थे' इस वाक्यद्वारा पहले ही प्रदर्शन कराया गया है। इस अविद्याके विषयसे विरक्त हुए पुरुषका किसी प्रकार प्रत्यगात्मविषयक ब्रह्मविद्यामें अधिकार हो जाय—इसलिये तृतीय [अर्थात् उपनिषद्के पहले] अध्यायमें ही अविद्यासम्बन्धी समस्त विषयका उपसंहार कर दिया गया है। |