बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 546, कुल 1402 में से
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| ५४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी-अनुवाद |
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| चतुर्थे तु ब्रह्मविद्याविषयं प्रत्यगात्मानम् ‘ब्रह्म ते ब्रवाणि’ (२। १। १) इति ‘ब्रह्म ज्ञापयिष्यामि’ (२। १। १५) इति च प्रस्तुत्य, तद्ब्रह्मैकमद्वयं सर्वविशेषशून्यं क्रियाकारकफलस्वभावसत्यशब्दवाच्याशेषभूतधर्मप्रतिषेधद्वारेण ‘नेति नेति’ इति ज्ञापितम्। | चतुर्थ अध्यायमें तो ‘मैं तेरे प्रति ब्रह्मका उपदेश करूँगा’ तथा ‘मैं तुझे ब्रह्मज्ञान कराऊँगा’ इस प्रकार ब्रह्मविद्याके विषयभूत प्रत्यगात्माका आरम्भ कर क्रिया, कारक, फल, स्वभाव और सत्य इन शब्दोंके वाच्य समस्त जीवधर्मोके प्रतिषेधद्वारा ‘नेति-नेति’ इस वाक्यसे उस अशेषविशेषशून्य एक अद्वय-ब्रह्मका ज्ञान कराया गया है। |
| अस्य ब्रह्मविद्याया अङ्गत्वेन <br> (संन्यासस्य ब्रह्मविद्याङ्गत्वम्) <br> संन्यासो विधित्सितः, जायापुत्रवित्तादिलक्षणं पाङ्क्तं कर्माविद्याविषयं यस्मान्नात्मप्राप्तिसाधनम्; अन्यसाधनं ह्यन्यस्मै फलसाधनाय प्रयुज्यमानं प्रतिकूलं भवति। न हि बुभुक्षापिपासानिवृत्त्यर्थं धावनं गमनं वा साधनम्; मनुष्यलोकपितृलोकदेवलोकसाधनत्वेन हि पुत्रादिसाधनानि श्रुतानि, नात्मप्राप्तिसाधनत्वेन। | अब इस ब्रह्मविद्याके अङ्गरूपसे संन्यासका विधान करना है; क्योंकि स्त्री, पुत्र एवं धनादिरूप पाङ्क्तकर्म अविद्याका विषय है, वह आत्मप्राप्तिका साधन नहीं है। किसी अन्य फलकी प्राप्तिके लिये अन्य साधनका प्रयोग करना प्रतिकूल ही होता है। भूख या प्यासकी निवृत्तिके लिये दौड़ना या चलना साधन नहीं हो सकता। पुत्रादि साधन तो मनुष्यलोक, पितृलोक अथवा देवलोककी प्राप्तिके ही साधनरूपसे सुने गये हैं, आत्मप्राप्तिके साधनरूपसे नहीं सुने गये। |
| विशेषितत्वाच्च; न च ब्रह्मविदो विहितानि, काम्यत्वश्रवणात्—‘एतावान्वै कामः’ इति। | [ ‘काम’ शब्दसे ] विशेषित होनेके कारण भी ये ब्रह्मविद्याके साधन नहीं हैं; ‘इतना ही काम है’ इस प्रकार कर्मोंका काम्यत्व सुना |