भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 547, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 547
ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ५४१
संस्कृत मूल / भाष्यभाष्यार्थ
ब्रह्मविद्वाप्ताकामत्वादाप्तकामस्य कामानुपपत्तेः । "येषां नोऽय-मात्मायं लोकः" (४।४।२२) इति च श्रुतेः ।जानेके कारण विहित कर्म ब्रह्मवेत्ताके लिये नहीं हैं; क्योंकि ब्रह्मवेत्ता आप्तकाम होता है और आप्तकामको कोई कामना होनी सम्भव नहीं है । इसके सिवा “जिन हमारे लिये यह आत्मलोक ही इष्ट है" इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है।
मतान्तर-निरासः<br>केचित्तु ब्रह्मविदोऽप्येषणा-सम्बन्धं वर्णयन्ति तैर्बृहदारण्यकं न श्रुतम्; पुत्राद्येषणानामविद्वद्विषयत्वम्; विद्याविषये च—'येषां नोऽयमात्मायं लोकः" (४।४।२२) इत्यतः "किं प्रजया करिष्यामः" (४ । ४ । २२) इत्येष विभागस्तैर्न श्रुतः श्रुत्या कृतः; सर्वक्रियाकारकफलोपमर्दस्वरूपायां च विद्यायां सत्याम्, सह कार्येणाविद्याया अनुपपत्तिलक्षणश्च विरोधस्तैर्न विज्ञातः ।कोई-कोई तो ब्रह्मवेत्ताका भी एषणाओंसे सम्बन्ध बतलाने लगते हैं, उन्होंने बृहदारण्यक नहीं सुना। पुत्रादि एषणाओंका सम्बन्ध तो अविद्वान्‌से ही होता है; विद्याके विषयमें उन्होंने श्रुतिका किया हुआ यह विभाग नहीं सुना कि “जिन हमको यह आत्मलोक ही इष्ट है" इसलिये “हम प्रजाको लेकर क्या करेंगे" इत्यादि । तथा उन्हें इस विरोधका भी पता नहीं है कि समस्त क्रिया, कारक और फलकी निषेधरूपा विद्याके होनेपर अपने कार्यके सहित अविद्या नहीं रह सकती ।
व्यासवाक्यं च तैर्न श्रुतम्; कर्मविद्यास्वरूपयोर्विद्याविद्यात्मकयोः प्रतिकूलवर्तनं विरोधः; "यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च ।तथा उन्होंने व्यासजीका वचन भी नहीं सुना; कर्मका स्वरूप अज्ञानमय और विद्याका स्वरूप ज्ञानमय है, उनमें एक दूसरेके विपरीत होनारूप विरोध है; जैसा कि "वेदके जो ऐसे वचन हैं कि 'कर्म करो' और 'कर्मका त्याग करो' सो