बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 548, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें५४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २
| कां गतिं विद्यया यान्ति<br>कां च गच्छन्ति कर्मणा ।<br>एतद्वै श्रोतुमिच्छामि<br>तद्भवान्प्रब्रवीतु मे ।<br>एतावन्योन्यवैरूप्ये<br>वर्तेते प्रतिकूलतः ॥”<br>इत्येवं पृष्टस्य प्रतिवचनेन—<br>“कर्मणा बध्यते जन्तु-<br>र्विद्यया च विमुच्यते ।<br>तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति<br>यतयः पारदर्शिनः ॥”<br>इत्येवमादिविरोधः प्रदर्शितः । | पुरुष ज्ञानके द्वारा किस गतिको प्राप्त होते हैं और कर्मसे किसे प्राप्त करते हैं ? इसे मैं सुनना चाहता हूँ, आप मुझे यह बताइये; क्योंकि कर्म और ज्ञान तो एक दूसरेसे विरुद्ध स्वभाववाले और प्रतिकूलतया विद्यमान हैं” इस तरह पूछे हुए प्रश्नका उत्तर देते हुए—“जीव कर्मसे बँधता है और ज्ञानसे मुक्त हो जाता है; इसलिये पारदर्शी मुनिजन कर्म नहीं करते” इस प्रकार कर्म तथा ज्ञानमें विरोध दिखाया गया है। | | तस्मान्न साधनान्तरसहिता ब्रह्मविद्या पुरुषार्थसाधनम्, सर्वविरोधात्, साधननिरपेक्षैव पुरुषार्थसाधनमिति पारिव्राज्यं सर्वसाधनसंन्यासलक्षणमङ्गत्वेन विधित्स्यते। | इसलिये ब्रह्मविद्या किसी अन्य साधनके साथ मिलकर पुरुषार्थका साधन नहीं होती, अपितु सबसे विरोध रहनेके कारण यह तो समस्त साधनोंसे निरपेक्ष रहकर ही पुरुषार्थका साधन होती है; अतः समस्त साधनोंके त्यागरूप संन्यासका इसके अङ्गरूपसे विधान करना अभीष्ट है । | | एतावदेव अमृतत्वसाधनम् इत्यवधारणात्, षष्ठसमाप्तौ, लिङ्गाच्च—कर्मी सन्याज्ञवल्क्यः प्रवव्राजेति । मैत्रेय्यै च कर्मसाधनरहितायै साधनत्वे- | 'इतना ही अमृतत्वका साधन है' ऐसा निश्चय किये जानेसे, याज्ञवल्क्यने कर्मी होते हुए भी संन्यास लिया—ऐसा छठे अध्यायके अन्तमें लिङ्ग होनेसे तथा कर्मरूप साधनसे रहित मैत्रेयीके प्रति अमृतत्वके |