भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 549, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 549
ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ५४३
संस्कृतहिन्दी
नामृतत्वस्य ब्रह्मविद्योपदेशाद् वित्तनिन्दावचनाच्च। यदि ह्यमृतत्वसाधनं कर्म स्याद् वित्तसाध्यं पाङ्क्तं कर्म, इति तन्निन्दावचनमनिष्टं स्यात्। यदि तु परितित्याजायिषितं कर्म, ततो युक्ता तत्साधननिन्दा।साधन रूपसे ब्रह्मविद्याका उपदेश किये जाने एवं धनकी निन्दा की जानेसे भी यही सिद्ध होता है। यदि कर्म अमृतत्वका साधन होता तो पाङ्क्तकर्म तो धनसे ही निष्पन्न होनेवाला है, अतः धनकी निन्दाका वचन इष्ट नहीं होता। कर्मके साधनभूत धनकी निन्दा तो तभी उचित होगी जब कि कर्मका त्याग कराना अभीष्ट होगा।
कर्माधिकारनिमित्तवर्णाश्रमादिप्रत्ययोपमर्दाच्च — “ब्रह्म तं परादात्” (२।४।६) “क्षत्रं तं परादात्” (२।४।६) इत्यादेः।इसके सिवा “ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है” “क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है” इत्यादि वाक्यसे कर्माधिकारके निमित्तभूत वर्णाश्रमादि प्रत्ययकी निवृत्ति हो जानेसे भी [यही सिद्ध होता है]।
न हि ब्रह्मक्षत्राद्यात्मप्रत्ययोपमर्दे, ब्राह्मणेनेदं कर्तव्यं क्षत्रियेणेदं कर्तव्यमिति विषयाभावादात्मानं लभते विधिः। यस्यैव पुरुषस्योपमर्दितः प्रत्ययो ब्रह्मक्षत्राद्यात्मविषयः, तस्य तत्प्रत्ययसंन्यासात् तत्कार्याणां कर्मणां कर्मसाधनानां च अर्थप्राप्तश्च संन्यासः। तस्मा-ब्राह्मणत्व और क्षत्रियत्वादि प्रत्ययका निरास हो जानेपर ‘ब्राह्मणको यह करना चाहिये’ ‘क्षत्रियको यह करना चाहिये’ इत्यादि विधिका कोई विषय न रहनेके कारण कोई स्वरूप नहीं रहता। जिस पुरुषका भी यह ब्राह्मणत्व और क्षत्रियत्वरूप प्रत्यय निवृत्त हो गया है, उसे तत्सम्बन्धी प्रत्यय न रहनेके कारण स्वतः ही उसके कार्यभूत कर्म और कर्मके साधनोंका संन्यास प्राप्त हो जाता है। अतः आत्मज्ञान-