बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 550, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 550
| ५४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| दात्मज्ञानाङ्गत्वेन संन्यासविधि- <br> त्सयैव आख्यायिकेयमारभ्यते— | के अङ्गरूपसे संन्यासका विधान <br> करनेकी इच्छासे ही यह आख्या- <br> यिका आरम्भ की जाती है— |
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मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्य उद्यास्यन्वा अरेऽहमस्मात्स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्यान्तं करवाणीति ॥ १ ॥
'अरी मैत्रेयी !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। 'मैं इस स्थान (गार्हस्थ्य-आश्रम) से ऊपर (संन्यास-आश्रममें) जानेवाला हूँ। अतः [तेरी अनुमति लेता हूँ और चाहता हूँ] इस कात्यायनीके साथ तेरा बँटवारा कर दूँ' ॥ १ ॥
| मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः— मैत्रेयीं स्वभार्यामामन्त्रितवान्याज्ञवल्क्यो नाम ऋषिः; उद्यास्यन्नूर्ध्वं यास्यन्पारिव्राज्याख्यमाश्रमान्तरं वै। अरे इति सम्बोधनम्। अहम्, अस्माद्गार्हस्थ्यात्, स्थानादाश्रमात्, ऊर्ध्वं गन्तुमिच्छन्नस्मि भवामि; अतो हन्तानुमतिं प्रार्थयामि ते तव; किञ्चान्यत्ते तवानया द्वितीयया भार्यया कात्यायन्यान्तं विच्छेदं करवाणि; पतिद्वारेण युवयोर्मया सम्बध्यमानयोर्यः सम्बन्ध आसीत्, तस्य सम्बन्धस्य | 'अरी मैत्रेयी !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा—अर्थात् याज्ञवल्क्यनामक ऋषिने अपनी भार्या मैत्रेयीको पुकारा; 'अरे' यह सम्बोधन है। मैं उद्यास्यन्—यहाँसे ऊपर पारिव्राज्यसंज्ञक आश्रमान्तरमें जानेवाला हूँ अर्थात् इस गृहस्थाश्रमसे ऊपर दूसरे आश्रममें जानेके लिये इच्छुक हूँ। इसलिये हन्त—तेरी अनुमति चाहता हूँ। और इसके सिवा [यह भी इच्छा है कि] इस अपनी दूसरी भार्या कात्यायनीके साथ तेरा अन्त यानी विच्छेद (बँटवारा) भी कर दूँ। पतिके द्वारा मुझसे सम्बद्ध हुई तुम दोनोंका आपसमें जो सम्बन्ध था, अब द्रव्य-विभाग करके उस सम्बन्धका विच्छेद |
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