बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 551, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 551
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५४५
| विच्छेदं करवाणि द्रव्यविभागं कृत्वा; वित्तेन संविभज्य युवां गमिष्यामि ॥ १ ॥ | कर दूँगा; अर्थात् धनके द्वारा तुम दोनोंका बँटवारा करके मैं चला जाऊँगा ॥ १ ॥ |
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सा होवाच मैत्रेयी । यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्कथं तेनामृता स्यामिति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितँ स्यादमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेनेति ॥२॥
उस मैत्रेयीने कहा, 'भगवन् ! यदि यह धनसे सम्पन्न सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं उससे किसी प्रकार अमर हो सकती हूँ?' याज्ञवल्क्यने कहा, नहीं, भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है, वैसा ही तेरा जीवन हो जायगा। धनसे अमृतत्वकी तो आशा है नहीं ॥ २ ॥
| सा एवमुक्ता होवाच—<br><br>यद्यदि 'नु' इति वितर्के मे<br><br>मम इयं पृथिवी, भगोः—<br><br>भगवन्, सर्वा सागरपरिच्छिन्ना<br><br>वित्तेन धनेन पूर्णा स्यात्; कथम्?<br><br>न कथञ्चनेत्याक्षेपार्थः, प्रश्नार्थो<br><br>वा, तेन पृथिवीपूर्णवित्तसा-<br><br>ध्येन कर्मणाग्निहोत्रादिना | इस प्रकार कही जानेपर मैत्रेयीने कहा—यहाँ 'नु' यह निपात वितर्कके लिये है। [क्या कहा ? सो बताते हैं—] भगवन् ! यदि यह समुद्रसे घिरी हुई तथा वित्त यानी धनसे पूर्ण सारी पृथिवी मेरी हो जाय, तो भी मैं किसी प्रकार [ अमर हो सकती हूँ? ] अर्थात् किसी भी प्रकार अमर नहीं हो सकती—इस प्रकार 'कथम्' शब्द आक्षेपके अर्थमें है अथवा यह प्रश्नार्थक भी हो सकता है, अर्थात् पृथिवीभरमें भरे हुए उस धनसे सम्पन्न होनेवाले |
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बृ० उ० ३५—