बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 552, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| अमृता किं स्यामिति व्यवहितेन सम्बन्धः। <br><br> प्रत्युवाच याज्ञवल्क्यः— कथमिति यद्याक्षेपार्थम्, अनुमोदनं नेति होवाच याज्ञवल्क्य इति; प्रश्नश्चेत्प्रतिवचनार्थम्; नैव स्या अमृता, किं तर्हि ! यथैव लोके उपकरणवतां साधनवतां जीवितं सुखोपायभोगसम्पन्नम्; तथैव तद्वदेव तव जीवितं स्यात्; अमृतत्वस्य तु नाशा मनसाप्यस्ति वित्तेन वित्तसाध्येन कर्मणेति ॥ २ ॥ | अग्निहोत्रादि कर्मसे क्या मैं अमर हो सकती हूँ—इस प्रकार इसका व्यवहित पदोंसे सम्बन्ध है। <br><br> याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया—'नहीं।' यदि 'कथम्' पदको आक्षेपार्थक माना जाय तो याज्ञवल्क्यने 'नहीं' ऐसा कहकर उसका अनुमोदन किया है; और यदि उसे प्रश्नार्थक माना जाय तो यह उत्तरके लिये है, अर्थात् तू उससे अमर नहीं हो सकती; तो क्या होगा ? लोकमें जैसा उपकरणवानोंका यानी नाना सामग्रियोंसे सम्पन्न लोगोंका जीवन सुखके साधनभूत भोगोंसे सम्पन्न होता है, वैसा ही तेरा जीवन भी हो जायगा; धनसे अर्थात् धनसाध्य कर्मसे अमृतत्वकी तो मनसे भी आशा नहीं है ॥ २ ॥ |
मैत्रेयीका अमृतत्वसाधनविषयक प्रश्न
सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥ ३ ॥
उस मैत्रेयीने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें ॥ ३ ॥
| सा होवाच मैत्रेयी; एवमुक्ता प्रत्युवाच मैत्रेयी—यद्येवं येनाहं | उस मैत्रेयीने कहा; इस प्रकार कहे जानेपर मैत्रेयीने उत्तर दिया—यदि ऐसी बात है तो जिससे मैं |
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