भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 563, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 563

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५५


| दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन, दुन्दुभिशब्दसामान्यविशेषत्वेन दुन्दुभिशब्दा एत इति, शब्दविशेषा गृहीता भवन्ति, दुन्दुभिशब्दसामान्यव्यतिरेकेणाभावात्तेषाम् ।<br><br>दुन्दुभ्याघातस्य वा, दुन्दुभेराहननम् आघातः, दुन्दुभ्याघातविशिष्टस्य शब्दसामान्यस्य ग्रहणेन तद्गता विशेषा गृहीता भवन्ति, न तु त एव निर्भिद्य ग्रहीतुं शक्यन्ते, विशेषरूपेणाभावात्तेषाम् । तथा प्रज्ञानव्यतिरेकेण स्वप्नजागरितयोर्न कश्चिद्वस्तुविशेषो गृह्यते; तस्मात्प्रज्ञानव्यतिरेकेण अभावो युक्तस्तेषाम् ॥ ७ ॥ | होनेसे अर्थात् दुन्दुभिके सामान्य शब्दके विशेषरूपसे 'ये दुन्दुभिके शब्द हैं, इस प्रकार वे विशेष शब्द भी गृहीत हो जाते हैं, क्योंकि दुन्दुभिके सामान्य शब्दको छोड़कर तो उनकी सत्ता ही नहीं है ।<br><br>अथवा दुन्दुभिके आघात—दुन्दुभिके आहननका नाम आघात है--उस दुन्दुभ्याघातविशिष्ट शब्द सामान्यका ग्रहण होनेसे उसके अन्तर्वर्ती विशेषोंका भी ग्रहण हो जाता है । उससे अलग करके उनका ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि विशेषरूपसे तो उनका अभाव है । इसी प्रकार स्वप्न और जागरितको किसी भी वस्तुविशेषका प्रज्ञानसे अलग ग्रहण नहीं किया जा सकता; अतः प्रज्ञानसे भिन्न उनका अभाव उचित ही है ॥ ७ ॥ |


स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्शब्दाञ्शक्नुयाद्ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥

वह [ दूसरा दृष्टान्त ] ऐसा है—जैसे कोई बजाये जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होता, किंतु शङ्खके अथवा शङ्खके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ८ ॥

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