बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 562, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| त्मैवेति ग्रहीतुं शक्यते ? <br><br> चिन्मात्रानुगमात्सर्वत्र चित्स्वरूपतैवेति गम्यते । तत्र दृष्टान्त उच्यते—यत्स्वरूपव्यतिरेकेणाग्रहणं यस्य, तस्य तदात्मत्वमेव लोके दृष्टम् । | ऐसा किस प्रकार ग्रहण किया जा सकता है ? <br><br> उत्तर—सर्वत्र चिन्मात्रकी अनुवृत्ति होनेके कारण सबकी चित्स्वरूपता ही है—ऐसा जाना जाता है। इस विषयमें दृष्टान्त बताया जाता है—जिसका जिसके स्वरूपसे अलग ग्रहण नहीं किया जा सकता, वह तद्रूप ही होता है—ऐसा लोकमें देखा गया है। |
स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्शब्दाञ्शक्नुयाद्ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥
वह दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार ताडन किये जाते हुए दुन्दुभि (नक्कारे) के बाह्य शब्दोंको कोई ग्रहण नहीं कर सकता, किंतु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी ग्रहण कर लिया जाता है ॥ ७ ॥
| स यथा— स इति दृष्टान्तः, लोके यथा दुन्दुभेर्भेर्यादेः, हन्यमानस्य ताड्यमानस्य दण्डादिना, न, बाह्याञ्छब्दान् बहिर्भूताञ्छब्दविशेषान् दुन्दुभिशब्दसामान्यान्निष्कृष्टान् दुन्दुभिशब्दविशेषान् न शक्नुयाद् ग्रहणाय ग्रहीतुम्; | स यथा अर्थात् वह दृष्टान्त ऐसा है—लोकमें जिस प्रकार दण्डादिसे हनन-ताडन किये जाते हुए दुन्दुभि-भेरी आदिके बाह्य शब्दोंको अर्थात् बाहर फैले हुए शब्दविशेषोंको—दुन्दुभिके सामान्य शब्दमेंसे निकाले हुए दुन्दुभिके विशेष शब्दोंको कोई ग्रहण नहीं कर सकता । दुन्दुभिका ग्रहण |