बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 561, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५५३
है। सभी उसे परास्त कर देते हैं जो सबको आत्मासे भिन्न देखता है। यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देवगण, ये भूतगण और ये सब जो कुछ भी हैं, यह सब आत्मा ही है ॥ ६ ॥
| ब्रह्म ब्राह्मणजातिस्तं पुरुषं परादात्परादध्यात्पराकुर्यात्; कम्? योऽन्यत्रात्मन आत्मस्वरूपव्यतिरेकेण—आत्मैवेन भवतीयं ब्राह्मणजातिरिति— तां यो वेद, तं परादध्यात्सा ब्राह्मणजातिरनात्मस्वरूपेण मां पश्यतीति; परमात्मा हि सर्वेषामात्मा। | ब्रह्म-ब्राह्मणजाति उस पुरुषको परादात्-पराहित-पराकृत यानी परास्त कर देती है; किसे ? जो आत्मासे भिन्न-आत्मस्वरूपको छोड़कर अर्थात् यह ब्राह्मणजाति आत्मा ही नहीं है, इस प्रकार जो उसे जानता है, उसे वह ब्राह्मणजाति यह सोचकर कि यह मुझे अनात्मारूपसे देखता है, परास्त कर देती है; क्योंकि परमात्मा ही सबका आत्मा है। | | तथा क्षत्रं क्षत्रियजातिः, तथा लोकाः, देवाः, भूतानि, सर्वम्। इदं ब्रह्मेति—यान्यनुक्रान्तानि तानि सर्वाणि, आत्मैव, यदयमात्मा—योऽयमात्मा द्रष्टव्यः श्रोतव्य इति प्रकृतः; यस्मादात्मनो जायत आत्मन्येव लीयत आत्ममयं च स्थितिकाले, आत्मव्यतिरेकेणाग्रहणात्, आत्मैव सर्वम् ॥ ६ ॥ | इसी प्रकार क्षत्र—क्षत्रियजाति तथा लोक, देव, भूत और सर्व, जिनका 'इदं ब्रह्म इदं क्षत्रम्' इत्यादिरूपसे अनुक्रम है, वे सब आत्मामें ही हैं। जो यह आत्मा कि द्रष्टव्यः, श्रोतव्यः इत्यादिरूपसे प्रकरणप्राप्त है; क्योंकि सब कुछ आत्मासे ही उत्पन्न होता है, आत्मामें ही लीन होता है तथा स्थितिकालमें भी आत्मस्वरूप ही है। आत्माको छोड़कर उपलब्ध न होनेके कारण सब कुछ आत्मा ही है ॥ ६ ॥ |
सबकी आत्मस्वरूपताके ग्रहणमें दुन्दुभि, शङ्ख और वीणाका दृष्टान्त
| कथं पुनरिदानीमिदं सर्वमा- | प्रश्न-किंतु इस समय (स्थितिकालमें) 'यह सब आत्मा ही है' |