भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 572
५६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
विषयसामान्यस्यापि बुद्धिविषयसामान्ये विज्ञानमात्रे; विज्ञानमात्रे भूत्वा परस्मिन्प्रज्ञानघने प्रलीयते।सामान्यका भी बुद्धिके विषय-सामान्यरूप विज्ञानमात्रमें और फिर विज्ञानमात्र होकर प्रज्ञानघन परमात्मामें लय हो जाता है।
तथा कर्मेन्द्रियाणां विषया वदनादानगमनविसर्गानन्दविशेषाः तत्तत्क्रियासामान्येष्वेव प्रविष्टा न विभागयोग्या भवन्ति, समुद्र इवाब्विशेषाः; तानि च सामान्यानि प्राणमात्रम्, प्राणश्च प्रज्ञानमात्रमेव। "यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वै प्रज्ञा स प्राणः" (कौषी० उ० ३।३) इति कौषीतकिनोऽधीयते।इसी प्रकार कर्मेन्द्रियोंके भाषण, ग्रहण, गमन, त्याग और आनन्द-रूप विशेष विषय उन-उन क्रियाओंके सामान्योंमें प्रविष्ट होकर विभागके योग्य नहीं रहते, जिस प्रकार कि समुद्रमें गये हुए जल-विशेष। वे सारे सामान्य प्राणमात्र हैं और प्राण प्रज्ञानमात्र ही हैं। कौषीतकी शाखावाले कहते हैं— "जो प्राण है वही प्रज्ञा है और जो प्रज्ञा है वही प्राण है।"
ननु सर्वत्र विषयस्यैव प्रलयोऽभिहितः, न तु करणस्य; तत्र कोऽभिप्राय इति ?शङ्का—किंतु यहाँ सर्वत्र विषयका ही लय बतलाया गया है, इन्द्रियका नहीं—सो इसमें क्या कारण है ?
बाढम्; किन्तु विषयसमानजातीयं करणं मन्यते श्रुतिः, न तु जात्यन्तरम्; विषयस्यैव स्वात्मग्राहकत्वेन संस्थानान्तरं करणं नाम—यथा रूपविशेषस्यैव संस्थानं प्रदीपः करणं सर्वरूपप्रकाशने, एवं सर्वविषयविशेषाणामेव स्वा-समाधान—ठीक है, किंतु श्रुति इन्द्रियको विषयकी सजातीय मानती है, अन्य जातिवाली नहीं। विषयका ही अपने ग्राहकरूपसे जो अन्य स्वरूप है, उसीका नाम इन्द्रिय है। जिस प्रकार रूपविशेषका ही संस्थान-मात्र दीपक सब प्रकारके रूपोंको प्रकाशित करनेमें साधन है, इसी प्रकार दीपकहीकी तरह समस्त