बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 583, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७५
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरँ शृणोति तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं विजानाति यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं जिघ्रेत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कँ शृणुयात्तत्केन कमभिवदेत्तत्केन कं मन्वीत तत्केन कं विजानीयात् । येनेदँ सर्वं विजानाति तं केन विजानीयाद्विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ॥ १४ ॥
जहाँ (अविद्यावस्थामें) द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्यका मनन करता है तथा अन्य अन्यको जानता है। किंतु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है वहाँ किसके द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सुने, किसके द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसका मनन करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उसे किसके द्वारा जाने ? हे मैत्रेयि ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने ? ॥ १४ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| यत्र यस्मिन्नविद्याकल्पिते कार्यकरणसङ्घातोपाधिजनिते विशेषात्मनि खिल्यभावे हि यस्मात्, द्वैतमिव--परमार्थतोऽद्वैते ब्रह्मणि द्वैतमिव भिन्नमिव वस्त्वन्तरमात्मनः--उपलक्ष्यते ।<br><br>ननु द्वैतेनोपमीयमानत्वाद् द्वैतस्य पारमार्थिकत्वमिति; न, "वाचा- | हि—क्योंकि जहाँ जिस अविद्याकल्पित देहेन्द्रियसङ्घातरूप उपाधिसे उत्पन्न हुए विशेषात्मरूप खिल्यभावमें द्वैत-सा अर्थात् परमार्थतः अद्वैत ब्रह्ममें द्वैत-सा भिन्न-सा अर्थात् आत्मासे भिन्न पदार्थ-सा प्रतीत होता है—[शङ्का—] किन्तु द्वैतसे उपमा दिये जानेके कारण तो द्वैतकी पारमार्थिकता सिद्ध होती है। [समाधान—] नहीं, क्योंकि "विकार |