भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 604, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 604
५९६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| यमात्मा सर्वैरूपास्यः सर्वेषां भूतानामधिपतिः सर्वभूतानां स्वतन्त्रो न कुमारामात्यवत्, किं तर्हि ? सर्वेषां भूतानां राजा । राजत्वविशेषणमधिपतिरिति; भवति कश्चिद्राजोचितवृत्तिमाश्रित्य राजा, न त्वधिपतिः, अतो विशिनष्ट्यधिपतिरिति । एवं सर्वभूतात्मा विद्वान् ब्रह्मविन्मुक्तो भवति । | है, सबके द्वारा उपास्य है, सब भूतोंका अधिपति है और समस्त भूतोंमें स्वतन्त्र है, सो भी कुमार या मन्त्रीके समान नहीं, तो किस प्रकार ? समस्त भूतोंका राजा है। 'अधिपति' यह राजत्वका विशेषण है; कोई पुरुष राजोचितवृत्तिका आश्रय लेकर राजा तो हो जाता है, किंतु अधिपति नहीं होता' इसलिये उसका 'अधिपति' यह विशेषण देते हैं। ऐसा सर्वभूतात्मा ब्रह्मवेत्ता विद्वान् मुक्त हो जाता है । | | यदुक्तं 'ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु तद्ब्रह्मावेद्यस्मात्तत्सर्वमभवत्' (१।४।९) इतीदं तद् व्याख्यातम् । एवमात्मानमेव सर्वात्मत्वेन आचार्यागमाभ्यां श्रुत्वा, मत्वा तर्कतो विज्ञाय साक्षादेवं यथा मधुब्राह्मणे दर्शितं तथा, तस्माद्ब्रह्मविज्ञानादेवंलक्षणात्, पूर्वमपि ब्रह्मैव सदविद्यया अब्रह्मासीत्, सर्वमेव च सदसर्वमासीत्, तां त्वविद्यामस्माद्विज्ञानात्तिरस्कृत्य | [ श्रुतिमें ] पहले जो यह कहा है कि 'ब्रह्मविद्यासे हम सर्वरूप हो जायेंगे-ऐसा मनुष्य मानते हैं, सो उस ब्रह्मने क्या जाना जिससे वह सर्वरूप हो गया' उसीकी यह व्याख्या की गयी है । इस प्रकार गुरु और शास्त्रसे आत्माको ही सर्वात्मभावसे सुनकर, तर्कद्वारा मनन कर तथा जिस प्रकार मधुब्राह्मणमें दिखाया गया है, उस प्रकार उक्त लक्षणवाले उस ब्रह्मविज्ञानसे ही साक्षात् जानकर, जो पहले भी ब्रह्म होते हुए ही अविद्यावश अब्रह्म बना हुआ था, एवं सर्वरूप होते हुए ही असर्व था, अब इस ज्ञानके द्वारा उस अविद्या- |