भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 665, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 665

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५५


| प्राणमनांसि, तत्र कतीति प्रश्नो नोपपद्यते निर्ज्ञातत्वात् । <br><br> न; अनवधारणार्थत्वात्; न हि चतुष्ट्वं तत्र विवक्षितम्, इह तु ग्रहातिग्रहदर्शनेऽष्टत्वगुणविवक्षया कतीति प्रश्न उपपद्यत एव । तस्मात् ‘स मुक्तिः सातिमुक्तिः’ इति मुक्त्यतिमुक्ती द्विरुक्ते । ग्रहातिग्रहा अपि सिद्धाः, अतः कतिसङ्ख्याका ग्रहाः कति वा अतिग्रहा इति पृच्छति । इतर आह—अष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति । ये तेऽष्टौ ग्रहा अभिहिताः कतमे ते नियमेन ग्रहीतव्या इति ॥ १ ॥ | सम्यक् प्रकारसे ज्ञान होनेके कारण उनके विषयमें 'वे कितने हैं' ऐसा प्रश्न होना उपपन्न नहीं है । <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वहाँ ऐसा निश्चय नहीं किया गया अर्थात् वहाँ यह बतलाना अभीष्ट नहीं है कि वे चार ही हैं; यहाँ तो ग्रह-अतिग्रह दर्शनमें उनका आठ होना—यह गुण बतलाना अभीष्ट है, इसलिये वे कितने हैं? ऐसा प्रश्न बन ही सकता है। पूर्व ब्राह्मणवाक्यसे ‘स मुक्तिः सातिमुक्तिः’ इस प्रकार मुक्ति और अतिमुक्ति दो बतलाये गये हैं, इसलिये ग्रह और अतिग्रह भी सिद्ध हो जाते हैं। इसीसे आर्तभाग यह प्रश्न करता है कि ग्रह कितनी संख्यावाले हैं और अतिग्रह कितने हैं। इसपर याज्ञवल्क्य कहते हैं—आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं। तब आर्तभाग पूछता है—वे जो आठ ग्रह बतलाये गये, सो नियमसे किन्हें ग्रहण करना चाहिये ॥ १ ॥ |


घ्राणादि इन्द्रियोंका ग्रहत्व और गन्धादि विषयोंका अतिग्रहत्वनिरूपण

तत्राह—इसपर याज्ञवल्क्य कहता है –

प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्राहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धाञ्जिघ्रति ॥ २ ॥