भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 679, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 679

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६९


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
न्येवापक्रामन्ति प्राङ्मोक्षात् तत्र । देवताभिरनधिष्ठितानि करणानि न्यस्तदात्राद्युपमानानि, विदेहश्च कर्ता पुरुषोऽस्वतन्त्रः किमाश्रितो भवति ? इति पृच्छ्यते—क्वायं तदा पुरुषो भवतीति, किमाश्रितस्तदा पुरुषो भवति ? इति यमाश्रयमाश्रित्य पुनः कार्यकरणसङ्घातमुपादत्ते, येन ग्रहातिग्रहलक्षणं बन्धनं प्रयुज्यते, तत् किम् ? इति प्रश्नः ।पूर्व इन्द्रियोंका उच्छेद नहीं होता । उस अवस्थामें देवताओंसे अनधिष्ठित इन्द्रियाँ कर्ताके हाथसे छूटे हुए दराँत आदि औजारोंके समान हो जाती हैं, अतः अस्वतन्त्र कर्ता पुरुष देहहीन होनेपर किसके आश्रित रहता है। यही 'क्वायं तदा पुरुषो भवति' इस वाक्यसे पूछा जाता है, अर्थात् उस समय यह पुरुष किसके आश्रित रहता है ? जिस आश्रयको आश्रित करके यह पुनः कार्य-करण संघातको ग्रहण करता है और जिसकी प्रेरणासे ग्रहातिग्रहरूप बन्धन प्राप्त होता है, वह आश्रय क्या है ? ऐसा प्रश्न है ।
अत्रोच्यते--स्वभावयदॄच्छाकालकर्मदैवविज्ञानमात्रशून्यानि वादिभिः परिकल्पितानि; अतोऽनेकविप्रतिपत्तिस्थानत्वान्नैव जल्पन्यायेन वस्तुनिर्णयः । अत्र वस्तुनिर्णयं चेदिच्छसि, आहर सोम्य हस्तमार्तभाग हे, आवामेवइस विषयमें यह कहा जाता है—वादियोंने स्वभाव, यदृच्छा, काल, कर्म, दैव, विज्ञानमात्र और शून्य ऐसे अनेकों आश्रयस्थानोंकी कल्पना की है; इसलिये अनेक विरोधोंका स्थान होनेके कारण केवल जल्पन्यायसे वस्तुका निर्णय नहीं हो सकता । इस विषयमें यदि तुम वस्तुका निर्णय सुनना चाहते हो तो हे प्रियदर्शन आर्तभाग ! तुम मुझे अपना हाथ पकड़ाओ । तुम्हारे प्रश्नका जो ज्ञातव्य

१. जीतकी इच्छासे किये हुए व्यर्थ उत्तर-प्रत्युत्तर या विवादको 'जल्प' कहते हैं।