बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 725, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ५] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७१५ |
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| विक्याविद्यया ब्रह्मस्वरूपं रज्जुशुक्तिकागगनस्वरूपवदेव स्वेन रूपेण वर्तमानं केनचिदस्पृष्टस्वभावमपि सत्—नामरूपकृतकार्यकरणोपाधिभ्यो विवेकेन नावधार्यते, नामरूपोपाधिदृष्टिरेव च भवति स्वाभाविकी, तदा सर्वोऽयं वस्त्वन्तरास्तित्वव्यवहारः। | रज्जु, शुक्ति और आकाशके स्वरूपके समान किसीसे भी अछूते स्वभाववाला होकर अपने निजरूपसे विद्यमान रहते हुए भी ब्रह्मके स्वरूपका स्वाभाविकी अविद्याके कारण नामरूपजनित देहेन्द्रियरूप उपाधिसे अलग करके निश्चय नहीं किया जाता और स्वाभाविकिकी नाम-रूप उपाधिकी ही दृष्टि रहती है, उस समय यह ब्रह्मसे भिन्न वस्तुकी सत्तासे सम्बन्ध रखनेवाला सारा व्यवहार रहता है। | | अस्ति चायं भेदकृतो मिथ्याव्यवहारः, येषां ब्रह्मतत्त्वादअन्यत्वेन वस्तु विद्यते, येषां च नास्ति; परमार्थवादिभिस्तु श्रुत्यनुसारेण निरूप्यमाणे वस्तुनि—किं तत्त्वतोऽस्ति वस्तु किं वा नास्तीति, ब्रह्मैकमेवाद्वितीयं सर्वसंव्यवहारशून्यमिति निर्धार्यते; तेन न कश्चिद् विरोधः। | तथा यह भेदकृत मिथ्या व्यवहार तो, जिनकी दृष्टिमें ब्रह्मतत्त्वसे भिन्न वस्तु है और जिनकी दृष्टिमें नहीं है, उन दोनों को ही रहता है; किंतु जो परमार्थवादी हैं वे, कौन-सी वस्तु तत्त्वतः हे और कौन-सी नहीं है-इस प्रकार श्रुतिके अनुसार वस्तुका निरूपण किये जानेपर, यही निश्चय करते हैं कि सम्पूर्ण व्यवहारसे रहित एक अद्वितीय ब्रह्म ही सत्य है; इसलिये उनका व्यवहार रहनेमें भी कोई विरोध नहीं है। | | न हि परमार्थावधारणनिष्ठायां वस्त्वन्तरास्तित्वं प्रतिपद्यामहे—"एकमेवाद्वितीयम्" "अनन्तरमबाह्यम्" (बृ० उ० २।५।१९) | हम परमार्थनिश्चयकी निष्ठामें किसी अन्य वस्तुकी सत्ता स्वीकार नहीं करते, जैसा कि "एक ही अद्वितीय ब्रह्म है" "वह अन्तर बाह्यशून्य है" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध |