भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 754, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 754

| ७४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [३. अध्याय ३ | | :--- | :--- |

| प्रतिपत्तव्यं जन्म, सर्वाणि च भूतानि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि, सन्दब्धानि सङ्ग्रथितानि स्रगिव सूत्रेण विष्टब्धानि भवन्ति येन—तत् किं सूत्रं वेत्थ ? सोऽब्रवीदेवं पृष्टः काप्यः—नाहं तद् भगवन् वेदेति, तत् सूत्रं नाहं जाने हे भगवन्निति सम्पूजयन्नाह । | आगे प्राप्त होनेवाला जन्म और ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूत संदृब्ध—संग्रथित—सूत्रसे मालाके समान सम्यक् प्रकारसे धारण किये हुए हैं, क्या उस सूत्रको तुम जानते हो ?' इस प्रकार पूछे जानेपर उस काप्यने कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता।' 'हे भगवन् !' इस प्रकार सत्कार करते हुए उसने कहा, 'मैं उस सूत्रको नहीं जानता।' | | सोऽब्रवीत् पुनर्गन्धर्व उपाध्यायमस्मांश्च—वेत्थ न त्वं काप्य तमन्तर्यामिणम् ? अन्तर्यामीति विशेष्यते—य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरोऽभ्यन्तरः सन् यमयति नियमयति, दारुयन्त्रमिव भ्रामयति, स्वं स्वमुचितव्यापारं कारयतीति । सोऽब्रवीदेवमुक्तः पतञ्चलः काप्यः—नाहं तं जाने भगवन्निति सम्पूजयन्नाह । | 'उस गन्धर्वने उपाध्यायसे और हमसे फिर पूछा, 'काप्य ! क्या तुम उस अन्तर्यामीको जानते हो ?' 'अन्तर्यामी' इस पदका विशेषण बतलाता है—'जो इस लोकको, परलोकको और सम्पूर्ण भूतोंको अन्तर--भीतर रहकर नियमित करता है—काष्ठयन्त्रके समान भ्रमित अर्थात् अपना-अपना उचित व्यापार कराता है [ क्या उसे तुम जानते हो ?]'। इस प्रकार कहे जानेपर उस पतञ्चल काप्यने 'भगवन् !' इस प्रकार सत्कार करते हुए कहा, 'मैं उसे नहीं जानता।' | | सोऽब्रवीत् पुनर्गन्धर्वः; सूत्रतदन्तर्गतान्तर्यामिणोर्विज्ञानं स्तूयते—यः कश्चिद् वै तत् सूत्रं हे काप्य विद्याद् विजानीयात् तं चान्तर्या- | 'उस गन्धर्वने फिर कहा; अब सूत्र और उसके अन्तर्वर्ती अन्तर्यामीके विज्ञानकी स्तुति की जाती है—'हे काप्य ! तुममेंसे जो कोई भी उस सूत्रको और सूत्रके अन्तर्गत उसी सूत्रके नियन्ता अन्तर्यामीको |