बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 757, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७४७
सन्दब्धानि भवन्ति तस्माद्वै गौतम पुरुषं प्रेत-
माहुर्व्यस्र्ꣳसिषतास्याङ्गानीति वायुना हि गौतम
सूत्रेण सन्दब्धानि भवन्तीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्या-
न्तर्यामिणं ब्रूहीति ॥ २ ॥
उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गौतम ! वायु ही वह सूत्र है; गौतम ! वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक, परलोक और समस्त भूतसमुदाय गूँथे हुए हैं। हे गौतम ! इसीसे मरे हुए पुरुषको ऐसा कहते हैं कि इसके अङ्ग विस्रस्त (विशीर्ण) हो गये हैं; क्योंकि हे गौतम ! वे वायुरूप सूत्रसे ही संग्रथित होते हैं।' [आरुणि—] 'हे याज्ञवल्क्य ! ठीक है, यह तो ऐसा ही है, अब तुम अन्तर्यामीका वर्णन करो' ॥ २ ॥
| स होवाच याज्ञवल्क्यः। ब्रह्मलोका यस्मिन्नोताश्च प्रोताश्च वर्तमाने काले, यथा पृथिव्यप्सु, तत् सूत्रम् आगमगम्यं वक्तव्यमिति तदर्थं प्रश्नान्तरमुत्थापितम्; अतस्तन्निर्णयायाह—वायुर्वै गौतम तत् सूत्रम्, नान्यत्; वायुरिति सूक्ष्ममाकाशवद्विष्टम्भकं पृथिव्यादीनाम्, यदात्मकं सप्तदशविधं लिङ्गं कर्मवासनासमवायि प्राणिनाम्, यत्तत् समष्टिव्यष्ट्यात्मकम्, यस्य बाह्या भेदाः सप्तसप्त मरुद्गणाः | उस याज्ञवल्क्यने कहा। जिस प्रकार जलमें पृथिवी ओतप्रोत है उसी प्रकार जिसमें वर्तमान कालमें ब्रह्मलोक ओतप्रोत हैं, शास्त्रद्वारा जानने योग्य उस सूत्रका वर्णन करना है, इसीलिये एक अन्य प्रश्न उठाया गया था, उसका निर्णय करनेके लिये याज्ञवल्क्य कहते हैं, 'हे गौतम ! वायु ही वह सूत्र है, और कुछ नहीं।' यहाँ वायु—यह आकाशके समान सूक्ष्म तत्त्व है और पृथिवी आदि भूतोंको धारण करनेवाला है; प्राणियोंका यह कर्म-वासनासमवायी (कर्म-संस्कारसे युक्त) सत्रह अवयवोंवाला लिङ्गदेह जिससे उत्पन्न हुआ है, जो समष्टि एवं व्यष्टिरूप है तथा समुद्रकी तरङ्गोंके समान उन्चास मरुद्गण |