बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 769, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 769
ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७५९
हममं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि तौ चेन्मे वक्ष्यति न जातु युष्माकमिमं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं जेतेति पृच्छ गार्गीति ॥ १॥
फिर वाचक्नवीने कहा, 'पूजनीय ब्राह्मणगण ! अब मैं इनसे दो प्रश्न पूछूँगी। यदि ये मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे तो आपमेंसे कोई भी इन्हें ब्रह्मसम्बन्धी वादमें नहीं जीत सकेगा।' [ ब्राह्मण-] 'अच्छा गार्गि ! पूछ' ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| अथ ह वाचक्नव्युवाच । पूर्वं याज्ञवल्क्येन निषिद्धा मूर्धपातभयादुपरता सती पुनः प्रष्टुं ब्राह्मणानाज्ञां प्रार्थयते—हे ब्राह्मणा भगवन्तः पूजावन्तः शृणुत मम वचः; हन्ताहमिमं याज्ञवल्क्यं पुनर्द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि, यद्यनुमतिर्भवतामस्ति; तौ प्रश्नौ चेद्यदि वक्ष्यति कथयिष्यति मे, कथञ्चिन्न वै जातु कदाचिद् युष्माकं मध्ये इमं याज्ञवल्क्यं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं ब्रह्मवदनं प्रति जेता न वै कश्चिद् भवेदिति । एवमुक्ता ब्राह्मणा अनुज्ञां प्रददुः—पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥ | फिर वाचक्नवीने कहा। पहले याज्ञवल्क्यके निषेध करनेपर मस्तक गिर जानेके भयसे मौन हुई वाचक्नवी पुनः प्रश्न करनेके लिये ब्राह्मणोंसे आज्ञा माँगती है—'हे भगवान्—पूजावान् ब्राह्मणगण ! मेरी बात सुनिये; यदि आपलोगोंकी अनुमति हो तो मैं इन याज्ञवल्क्यजीसे दो प्रश्न ओर पूछूँगी। यदि ये उन दो प्रश्नोंका मुझे उत्तर दे देंगे तो आपमेंसे कोई भी इन याज्ञवल्क्यजीको ब्रह्मसम्बन्धी वादमें कभी किसी प्रकार भी जीतनेवाला नहीं हो सकेगा। इस प्रकार कहे जानेपर ब्राह्मणोंने 'हे गार्गि ! तू पूछ' ऐसा कहकर अपनी अनुमति दे दी ॥ १ ॥ |
सा होवाचाहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थां तौ मे ब्रूहीति पृच्छ गार्गीति ॥ २ ॥