भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 770, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 770
७६०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

वह बोली, 'हे याज्ञवल्क्य ! जिस प्रकार काशी या विदेहका रहनेवाला कोई वीर-वंशज प्रत्यञ्चाहीन धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर शत्रुओंको अत्यन्त पीडा देनेवाले दो बाणवान् शर हाथमें लेकर खड़ा होता है, उसी प्रकार मैं दो प्रश्न लेकर तुम्हारे सामने उपस्थित होती हूँ; तुम मुझे उनका उत्तर दो।' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, गार्गि ! 'पूछ' ॥ २ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
लब्धानुज्ञा ह याज्ञवल्क्यं सा होवाच—अहं वै त्वा त्वां द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामीत्यनुषज्यते; कौ ताविति जिज्ञासायां तयोर्दु॒रुत्तरत्वं द्योतयितुं दृष्टान्तपूर्वकं तावाह— हे याज्ञवल्क्य यथा लोके काश्यः– काशिषु भवः काश्यः, प्रसिद्धं शौर्यं काश्ये, वैदेहो वा विदेहानां वा राजा, उग्रपुत्रः शूरान्वय इत्यर्थः, उज्ज्‍यं अवतारितज्यकं धनुः पुनरधिज्यम् आरोपितज्याकं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ—बाणशब्देन शराग्ने यो वंशखण्डः सन्धीयते, तेन विनापि शरो भवतीत्यतो विशिनष्टि बाणवन्ताविति—द्वौआज्ञा मिलनेपर उसने याज्ञवल्क्यसे कहा—'मैं तुमसे दो प्रश्न पूछूँगी' ऐसा इसका अन्वय है । वे प्रश्न कौन-से हैं ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर यह दिखलानेके लिये कि उनका उत्तर देना कठिन है, गार्गी उन्हें दृष्टान्तपूर्वक बतलाती है—'हे याज्ञवल्क्य ! जिस प्रकार लोकमें कोई काश्य—'काशी' प्रान्तमें उत्पन्न हुआ, काशि-प्रान्तमें उत्पन्न होनेवालोंमें शूरवीरता प्रसिद्ध है अथवा वैदेह—विदेह-निवासी या विदेह देशका राजा उग्रपुत्र अर्थात् जो वीर वंशमें उत्पन्न हुआ है, वह उज्ज्य—जिसकी ज्या ( डोरी ) उतार ली गयी है, ऐसे धनुषको पुनः ज्यायुक्त कर अर्थात् उसकी प्रत्यञ्चा चढ़ा करके दो बाणवान्—यहाँ 'बाण' शब्दसे यह व्यक्त होता है कि शरके अग्रभागोंमें जो बाँसका टुकड़ा लगाया जाता है, उसके बिना भी बाण होता है, इसीसे 'बाणवान्' यह विशेषण दिया गया है, तात्पर्य यह