भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 775, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 775

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६५


| सर्वं यथोक्तं गार्ग्या प्रत्युच्चार्य तमेव पूर्वोक्तमर्थमवधारितवानाकाश एवेति याज्ञवल्क्यः । <br><br> गार्ग्याह—कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति । आकाशमेव तावत् कालत्रयातीतत्वाद् दुर्वाच्यम्, ततोऽपि कष्टतरमक्षरम्, यस्मिन्नाकाशमोतं च प्रोतं च, अतोऽवाच्यमिति कृत्वा, न प्रतिपद्यते सा अप्रतिपत्तिर्नाम निग्रहस्थानं तार्किकसमये; अथावाच्यमपि वक्ष्यति, तथापि विप्रतिपत्तिर्नाम निग्रहस्थानम्; विरुद्धा प्रतिपत्तिर्हि सा, यदवाच्यस्य वदनम्; अतो दुर्वचनं प्रश्नं मन्यते गार्गी ॥ ७ ॥ | गार्गीके पूर्वोक्त वाक्यको पुनः कहकर याज्ञवल्क्यने 'आकाशमें ही ओतप्रोत है' ऐसा कहकर पहले कही हुई बातकी ही पुष्टि की है। <br><br> गार्गीने कहा, 'किंतु आकाश किसमें ओतप्रोत है !' तीनों कालोंसे परे होनेके कारण पहले तो आकाशका ही बतलाना कठिन है, उससे भी क्लिष्टतर अक्षर है, जिसमें कि आकाश ओतप्रोत है; अतः यह समझकर कि वह अवाच्य है उसे कोई अनुभव नहीं कर सकता और अप्रतिपत्ति (अनुभव न होना)-यह तार्किकोंके सिद्धान्तमें निग्रहस्थान माना जाता है; और यदि याज्ञवल्क्यने इस अवाच्य विषयका भी वर्णन किया तो यह विप्रतिपत्तिरूप (विपरीत अनुभवरूप) निग्रहस्थान होगा, क्योंकि अवाच्यको कहना यह विरुद्ध प्रतिपत्ति ही है; इसलिये गार्गी इस प्रश्नका उत्तर बताना कठिन समझती है ॥ ७ ॥ |


याज्ञवल्क्यका उत्तर

तद् दोषद्वयमपि परिजिहीर्षन्नाह—इन (अप्रतिपत्ति और विप्रतिपत्ति) दोनों दोषोंको निवृत्त करनेकी इच्छासे याज्ञवल्क्य कहते हैं—