बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 774, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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उपक्रमसहित दूसरा प्रश्न
सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ६॥
वह बोली, ‘हे याज्ञवल्क्य ! जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथिवीसे नीचे है और जो द्युलोक और पृथिवीके मध्यमें है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे किसमें ओतप्रोत हैं ?’ ॥ ६ ॥
| व्याख्यातमन्यत्; सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्येत्यादिप्रश्नः प्रतिवचनं च उक्तस्यार्थस्यावधारणार्थं पुनरुच्यते; न किञ्चिदपूर्वमर्थान्तरमुच्यते ॥ ६ ॥ | अन्य ( छठे मन्त्रके पदों ) की व्याख्या पहले (तृतीय मन्त्रमें) की जा चुकी है। ‘यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य’ इत्यादि प्रश्न और इसका उत्तर पूर्वोक्त अर्थका ही निश्चय करनेके लिये पुनः कहा गया है; यहाँ कोई दूसरा अपूर्व ( नूतन ) अर्थ नहीं कहा गया ॥ ६ ॥ |
स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाश एव तदोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ७ ॥
उस याज्ञवल्क्यने कहा, ‘हे गार्गि ! जो द्युलोकसे ऊपर, पृथिवीसे नीचे और जो द्युलोक एवं पृथिवीके मध्यमें है तथा स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं और जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे सब आकाशमें ही ओतप्रोत हैं।’ [गार्गी—] ‘किंतु आकाश किसमें ओत-प्रोत है ?’ ॥ ७ ॥