बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 773, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 773
ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६३
| यदेतद् व्याकृतं सूत्रात्मकं जगदव्याकृताकाशे, अप्स्विव पृथिवीधातुः, त्रिष्वपि कालेषु वर्तते उत्पत्तौ स्थितौ लये च ॥ ४ ॥ | जो सूत्रस्वरूप व्याकृत जगत् है, वह जलमें पृथिवीतत्त्वके समान उत्पत्ति स्थिति और लय तीनों कालोंमें अव्याकृत आकाशमें विद्यमान है' ॥ ४ ॥ |
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सा होवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य यो म एतं व्यवोचोऽपरस्मै धारयस्वेति पृच्छ गार्गीति ॥ ५ ॥
वह बोली, 'हे याज्ञवल्क्य ! आपको नमस्कार है, जिन्होंने मुझे इस प्रश्नका उत्तर दे दिया; अब आप दूसरे प्रश्नके लिये तैयार हो जाइये। [ याज्ञवल्क्य- ] 'गार्गि ! पूछ' ॥ ५ ॥
| पुनः सा होवाच; नमस्तेऽस्त्वत्यादि प्रश्नस्य दुर्वचत्वप्रदर्शनार्थम्; यो मे ममैतं प्रश्नं व्यवोचो विशेषेणापाकृतवानसि; एतस्य दुर्वचत्वे कारणम्--सूत्रमेव तावदगम्यमितरैर्दुर्व्वाच्यम्, किमुत तत्, यस्मिन्नोतं च प्रोतं चेति; अतो नमोऽस्तु ते तुभ्यम् । अपरस्मै द्वितीयाय प्रश्नाय धारयस्व दृढीकुर्वात्मानमित्यर्थः । पृच्छ गार्गीतीतर आह ॥ ५ ॥ | उसने पुनः कहा; आपको नमस्कार है—इत्यादि कथन यह प्रदर्शित करनेके लिये है कि इस प्रश्नका उत्तर देना कठिन था। 'जिन आपने मेरे इस प्रश्नकी व्याख्या की है अर्थात् इसका विशेषरूपसे निराकरण किया है। इस प्रश्नकी कठिनाईमें कारण यह है कि प्रथम तों सूत्र ही अगम्य यानी किसी दूसरेके लिये दुर्वाच्य है, फिर जिसमें वह भी ओतप्रोत है, उसका तो कहना ही क्या है; इसलिये आपको नमस्कार है। अब अन्य यानी द्वितीय प्रश्नके लिये अपनेको तैयार यानी पक्का कर लीजिये। इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, 'गार्गि ! पूछ' ॥ ५ ॥ |
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