भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 776, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 776
७६६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिव-
दन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छाय-
मतमोऽवाय्वनाकाशमसङ्गम्रसमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्र-
मवागमनोऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्यं
न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन ॥ ८ ॥

उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गार्गि ! उस इस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता अक्षर कहते हैं; यह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न द्रव है, न छाया है, न तम (अन्धकार) है, न वायु है, न आकाश है, न सङ्ग है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, उसमें न अन्तर है, न बाहर है, वह कुछ भी नहीं खाता, उसे कोई भी नहीं खाता' ॥ ८ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
स होवाच याज्ञवल्क्यः—एतद् वै तद् यत् पृष्टवत्यसि कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति; किं तत् ? अक्षरम्—यन्न क्षीयते न क्षरतीति वाक्षरम्—तदक्षरं हे गार्गि ब्राह्मणा ब्रह्मविदोऽभि-वदन्ति । ब्राह्मणाभिवदनकथ-नेन—नाहमवाच्यं वक्ष्यामि न च न प्रतिपद्येयम्—इत्येवं दोष-द्वयं परिहरति ।उस याज्ञवल्क्यने कहा—तूने जिसके विषयमें पूछा था कि यह आकाश किसमें ओतप्रोत है ? वह यही है । वह क्या है ? अक्षर, जो क्षीण नहीं होता अथवा क्षरित नहीं होता, वह अक्षर है, सो हे गार्गि ! उसे ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता लोग अक्षर कहते हैं । 'ब्राह्मण कहते हैं' इस कथनके द्वारा—मैं अवाच्यका वर्णन नहीं करूँगा, तथा यह भी नहीं कि मैं उसे नहीं जानता—इस प्रकार सूचित करके दोनों दोषोंका परिहार करते हैं ।