भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 778, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 778
७६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अनाकाशम्; भवतु तर्हि सङ्गात्मकं जतुवत्, असङ्गम्; रसोऽस्तु तर्हि, अरसम्; तथा गन्धोऽस्त्वगन्धम्; अस्तु तर्हि चक्षुः, अचक्षुष्कम्—न हि चक्षुरस्य करणं विद्यतेऽतोऽचक्षुष्कम्; “पश्यत्यचक्षुः” ( श्वेता० उ० ३ । १९ ) इति मन्त्रवर्णात् ।<br><br>तथाश्रोत्रम्; “स शृणोत्यकर्णः” (श्वेता० उ० ३ । १९) इति; भवतु तर्हि वागवाक्; तथाऽमनः; तथाऽतेजस्कम्—अविद्यमानं तेजोऽस्य तदतेजस्कम्; न हि तेजोऽग्न्यादिप्रकाशवदस्य विद्यते; अप्राणम्—आध्यात्मिको वायुः प्रतिषिध्यतेऽप्राणमिति; मुखं तर्हि द्वारं तदमुखम्; अमात्रम्—मीयते येन तन्मात्रम् अमात्रं मात्रारूपं तन्न भवति, न तेन किञ्चिन्मीयते; अस्तु तर्हिच्छिद्रवत्, अनन्तरम्—नास्यान्तरमस्ति;होगा ? नहीं, अनाकाश है; तो फिर जतु ( लाक्षा ) के समान सङ्गवान् होगा ? नहीं, वह असङ्ग है; तो रस होगा ? नहीं, अरस है; अच्छा तो गन्ध होगा ? नहीं, अगन्ध है; तो फिर चक्षु होगा ? नहीं, अचक्षुष्क है; इसके चक्षु इन्द्रिय नहीं है; इसलिये यह अचक्षुष्क है; जैसा कि “यह चक्षुहीन होनेपर भी देखता है” इस मन्त्रवर्णसे प्रमाणित होता है।<br><br>इसी प्रकार “वह कर्णहीन होकर भी सुनता है” इस श्रुतिके अनुसार अश्रोत्र है; तो फिर वाक् होगा ? नहीं, अवाक् है; तथा अमन है और इसी प्रकार अतेजस्क जिसमें तेज नहीं है, ऐसा अतेजस्क, है, क्योंकि अग्नि आदिके प्रकाशके समान इसमें तेज नहीं है; अप्राण—ऐसा कहकर शरीरान्तर्गत वायुका प्रतिषेध किया जाता है, अतः अप्राण है। तो फिर वह मुख यानी द्वार है ? नहीं, वह अमुख है; वह अमात्र है, जिससे माप किया जाय उसे मात्र कहते हैं, वह अमात्र अर्थात् मात्रारूप नहीं है, उससे किसीका भी माप नहीं किया जाता; तो फिर वह छिद्रवान् होगा ? नहीं, वह अनन्तर है, उसमें अन्तर (छिद्र) नहीं है; तो फिर उसका
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