भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 781, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 781

ब्राह्मण ८ ]          शाङ्करभाष्यार्थ          ७७१


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
वता निर्मितौ च, स्यातां साधारणसर्वप्राणिप्रकाशोपकारकत्वान्लौकिकप्रदीपवत् । तस्मादस्ति तद् येन विधृतावीश्वरौ स्वतन्त्रौ सन्तौ निर्मितौ तिष्ठतो नियतदेशकालनिमित्तोदयास्तमयवृद्धिक्षयाभ्यां वर्तेते; तदस्त्येवमेतयोः प्रशासित्रक्षरम्, प्रदीपकर्तृविधारयितृवत् ।लिये रचा है, साधारणतया समस्त प्राणियोंका प्रकाशरूप उपकार करनेवाले होनेसे लौकिक दीपकोंके समान धारण किये हुए स्थित हैं। अतः ये दोनों (सूर्य और चन्द्र) स्वतन्त्र ईश्वर होनेपर भी जिसके द्वारा निर्मित और विधृत होकर नियत देश, काल और [प्राणियोंके अदृष्टरूप] निमित्तसे उदय-अस्त एवं वृद्धि-क्षयको प्राप्त होते हुए विद्यमान रहते हैं, वह अक्षर है तथा इस प्रकार वह अक्षर दीपकके कर्ता और विधारयिताके समान इन दोनोंका प्रशासनकर्ता है।
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ द्यौश्च पृथिवी च सावयवत्वात् स्फुटनस्वभावे अपि सत्यौ गुरुत्वात् पतनस्वभावे संयुक्तत्वाद् वियोगस्वभावे चेतनावदभिमानिदेवताधिष्ठितत्वात् स्वतन्त्रे अपि एतस्याक्षरस्य प्रशासने वर्तेते विधृते तिष्ठतः; एतद्ध्यक्षरं सर्वव्यवस्थासेतुः सर्वमर्यादाविधारणम्, अतो नास्याक्षरस्य प्र-**हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें 'द्यावापृथिव्यौ'—**द्युलोक और पृथिवी सावयव होनेके कारण फूटनेके स्वभाववाले, भारी होनेके कारण गिरनेके स्वभाववाले, संयुक्त होनेके कारण वियुक्त होनेके स्वभाववाले और चेतनावान् अभिमानी देवतासे अधिष्ठित होनेके कारण स्वतन्त्र होनेपर भी इस अक्षरके प्रशासनमें विधृत होकर स्थित हैं। यह अक्षर ही समस्त व्यवस्थाओंका सेतु—समस्त मर्यादाओंका विधारक है; अतः द्युलोक और पृथिवी इसके