बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 819, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८०९ |
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| रूपैः प्रयुक्तं तैरात्मग्रहणायारब्धं चक्षुः। तस्मात् सादित्यं चक्षुः सह प्राच्या दिशा सह तत्स्थैः सर्वै रूपेषु प्रतिष्ठितम्।<br><br>चक्षुषा सह प्राची दिक् सर्वा रूपभूता, तानि च कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति ? हृदय इति होवाच। हृदयारब्धानि रूपाणि। रूपाकारेण हि हृदयं परिणतम्। यस्माद् हृदयेन हि रूपाणि सर्वो लोको जानाति। हृदयमिति बुद्धिमनसो एकीकृत्य निर्देशः; तस्माद् हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि। हृदयेन हि स्मरणं भवति रूपाणां वासना- त्मनाम्; तस्माद् हृदये रूपाणि प्रतिष्ठितानि इत्यर्थः। एवमेवै- तद् याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥ | द्वारा वह प्रयुक्त होता है, उन्होंने अपनेको ग्रहण करनेके लिये ही चक्षुको उत्पन्न किया है। अतः आदित्यके सहित चक्षु प्राची दिशा और उस दिशामें स्थित समस्त पदार्थोंके सहित रूपोंमें प्रतिष्ठित है।<br><br>[ शाकल्य— ] चक्षुके सहित सम्पूर्ण प्राची दिशा रूपमात्र हैं, किंतु वे रूप किसमें प्रतिष्ठित हैं?' याज्ञवल्क्यने 'हृदयमें' ऐसा कहा। रूप हृदयसे आरम्भ (उत्पन्न) होने- वाले हैं; हृदय ही रूपाकारसे परि- णत होता है, क्योंकि सब लोग हृदयसे ही रूपको जानते हैं। 'हृदयम्' इस प्रकार मन और बुद्धि- को एक करके कहा गया है; अतः हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं। वासनारूप रूपोंका हृदयसे ही स्मरण होता है; अतः तात्पर्य यह है कि हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं। [शाकल्य—] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २० ॥ |
देवता और प्रतिष्ठाके सहित दक्षिण दिशाका वर्णन
किन्देवतोऽस्यां दक्षिणायां दिश्यसीति यमदेवत इति स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति यज्ञ इति कस्मिन्नु यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठि-