बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| अभिपूर्वो मन्यतिर्हिंसार्थः—हिंसिष्य इत्यर्थः; कनीयोऽन्नं करिष्ये कनीयोऽल्पमन्नं करिष्य इति । | पूर्वक 'मन' धातुका अर्थ हिंसा होता है—अतः 'अभिमंस्ये' का अर्थ 'मार डालूँगा' ऐसा होगा, तो मैं कनीय अन्न करूँगा; कनीय यानी बहुत ही थोड़ा अन्न भोजन करूँगा। | | एवमीक्षित्वा तद्भक्षणादुपरराम बहु ह्यन्नं कर्तव्यं दीर्घकालभक्षणाय न कनीयः। तद्भक्षणे हि कनीयोऽन्नं स्याद्वीजभक्षण इव सस्याभावः। स एवम्प्रयोजनमन्नबाहुल्यमालोच्य तयैव त्रय्या वाचा पूर्वोक्तया तेनैव चात्मना मनसा मिथुनीभावमालोचनमुपगम्योपगम्येदं सर्वं स्थावरं जङ्गमं चासृजत यदिदं किञ्च यत्किञ्चेदम् । किं तत् ? ऋचो यजूंषि सामानि छन्दांसि च सप्त गायत्र्यादीनि स्तोत्रशस्त्रादिकर्माङ्गभूतांस्त्रिविधान् मन्त्रान्गायत्र्यादिच्छन्दोविशिष्टान् यज्ञांश्च तत्साध्यान्प्रजास्तत्कर्त्रीः पशूंश्च ग्राम्यानारण्यान्कर्मसाधनभूतान् । | ऐसा सोचकर वह उसे भक्षण करनेसे रुक गया, [और सोचने लगा कि] बहुत समयतक खानेके लिये मुझे बहुत-सा अन्न [संग्रह] करना चाहिये, थोड़ा-सा नहीं। जिस प्रकार बीजको खा लेनेपर अनाज नहीं होता उसी प्रकार इसे खानेसे तो मेरे लिये थोड़ा-सा ही अन्न होगा। ऐसे उद्देश्यसे अन्नकी बहुलताके लिये विचारकर उसने उस पूर्वोक्त त्रयीरूपा वाणीसे तथा उसी आत्मा यानी मनसे मिथुनीभाव अर्थात् आलोचनाको प्राप्त हो-होकर यह जो कुछ है उस इस सारे स्थावर और जङ्गम जगत्की रचना की। वह क्या है ? ऋक्, यजुः, साम, गायत्री आदि सात छन्द यानी गायत्री आदि छन्दोंसे युक्त स्तोत्र-शस्त्रादि कर्मोंके अङ्गभूत तीन प्रकारके मन्त्र, उनसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञ, उन्हें करनेवाली प्रजा तथा कर्मके साधनभूत ग्राम्य और वन्य पशु [ इन सबको रचा ]। | | ननु त्रय्या मिथुनीभूतया- | शंका—किंतु पहले तो कहा |