बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 83, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| सृजतेत्युक्तम्, ऋगादीनीह कथमसृजतेति ? | गया था कि मिथुनीभूत त्रयीरूपा वाणीसे उसने रचना की, फिर उसके द्वारा उसने ऋगादिको कैसे रचा ? |
| नैष दोषः, मनसस्त्वव्यक्तोऽयं मिथुनीभावस्त्रय्या, बाह्यस्तु ऋगादीनां विद्यमानानामेव कर्मसु विनियोगभावेन व्यक्तीभावः सर्ग इति । | समाधान—यह कोई दोष नहीं है। मनका जो त्रयीके साथ मिथुनीभाव है वह तो अव्यक्त है। उन [अव्यक्तरूपसे] विद्यमान ऋगादिका ही कर्ममें विनियोगरूपसे जो बाह्य व्यक्तीभाव है वही उनकी रचना है। |
| स प्रजापतिरेवमन्नवृद्धिं बुद्ध्वा यद्यदेव क्रियां क्रियासाधनं फलं वा किञ्चिदसृजत तत्तदत्तुं भक्षयितुमप्रियत धृतवान्मनः। सर्वं कृत्स्नं वै यस्मादत्तीति तत्तस्माददितेरदितिनाम्नो मृत्योरदितित्वं प्रसिद्धम् । तथा च मन्त्रः—‘‘अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता’’ (यजुः० सं० २५। २३) इत्यादिः । | उस प्रजापतिने इस प्रकार अन्नकी वृद्धि होती जानकर जिस-जिस भी क्रिया या क्रियाके साधनभूत फलकी रचना की उसी—उसीको भक्षण करनेके लिये मनमें विचार किया। इस प्रकार क्योंकि वह सभीको भक्षण करता है, इसलिये उस अदिति अर्थात् अदिति नामक मृत्युका अदितित्व प्रसिद्ध है। इस विषयमें यह मन्त्र प्रमाण है—‘‘अदिति द्युलोक है, अदिति अन्तरिक्ष है, अदिति माता है और वही पिता है’’ इत्यादि। |
| सर्वस्यैतस्य जगतोऽन्नभूतस्यात्ता सर्वात्मनैव भवत्यन्यथा विरोधात् । न हि कश्चित्सर्वस्यैकोऽत्ता दृश्यते तस्मात्सर्वात्मा भवतीत्यर्थः। | इस अन्नभूत सम्पूर्ण जगत्का वह सर्वात्मभावसे ही अत्ता (भक्षण करनेवाला) है, क्योंकि बिना सर्वात्मभावके सबका अत्ता होनेमें विरोध आता है। कोई भी एक सबका अत्ता हो, ऐसा देखा नहीं जाता; इसलिये तात्पर्य यह है कि |