भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 84
७८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १]

| सर्वमस्यान्नं भवति; अत एव सर्वात्मनो ह्यत्तुः सर्वमन्नं भवतीत्युपपद्यते । य एवमेतद्यथोक्तमदितेर्मृत्योः प्रजापतेः सर्वस्यअदनाददितित्वं वेद तस्यैतत् फलम् ॥ ५ ॥ | [ इस प्रकार उपासना करनेवाला ] वह सर्वात्मा हो जाता है। सब कुछ उसका अन्न हो जाता है, अतः जो सर्वात्मभावसे अत्ता है उसीका सब कुछ अन्न होना सम्भव है। यह फल उसे मिलता है जो इस प्रकार इस उपर्युक्त अदितिसंज्ञक मृत्यु प्रजापतिका सबका अदन (भक्षण) करनेसे अदितित्व जानता है ॥ ५ ॥ |

प्रजापतिकी यज्ञकामना और उसके प्राण एवं वीर्यका निष्क्रमण

सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति । सोऽश्राम्यत्स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् । प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरँ श्वयितुमध्रियत तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६ ॥

उसने यह कामना की कि मैं पुनः बड़े भारी यज्ञसे यजन करूँ । इससे वह श्रमित हो गया । उसने तप किया । उस श्रमित और तपे हुए मृत्युका यश और वीर्य निकल गया । प्राण ही यश और वीर्य हैं । तब प्राणोंके निकल जानेपर शरीरने फूलना आरम्भ किया । किंतु उसका मन शरीरमें ही रहा ॥ ६ ॥

| सोऽकामयतेत्यश्वाश्वमेधयोर्निर्वचनार्थमिदमाह—भूयसा महता यज्ञेन भूयः पुनरपि यजेयेति । जन्मान्तरकरणापेक्षया भूयः- | 'सोऽकामयत' इत्यादि वाक्यसे श्रुति अश्व और अश्वमेधका निर्वचन करनेके लिये यह कहती है—मैं पुनः महान् यज्ञसे यजन करूँ। यहाँ जन्मान्तरमें यज्ञानुष्ठान करनेकी अपेक्षासे 'भूयस्' (महान्) शब्द |